वर्ष 2018 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के 25 वर्ष पूरे हो रहे हैं। आयोग का गठन 1993 के मानवाधिकार सुरक्षा अधिनियम के आधार पर किया गया था। अपने गठन की शुरूआत से ही आयोग विवादों में घिरा रहा है। संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में सरकार ने इस पर संशोधन प्रस्ताव प्रस्तुत करने की योजना बनाई है।
गठन पर एक नजर
1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मानवाधिकार पर पेरिस सिद्धांतों को आत्मसात किया था। तत्पश्चात् प्रायः प्रत्येक देश में मानवाधिकार संस्था का गठन किया गया। प्रत्येक पाँच वर्ष में इन संस्थाओं को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद् से मान्यता का नवीनीकरण कराना होता है। अन्य क्षेत्रों की तरह मानवाधिकार के क्षेत्र में भी ग्रेडिंग दी जाती है। अगर भारत को ए-ग्रेड मिल जाता है, तो उसे संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद् एवं अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की नीति-निर्धारण प्रक्रिया में स्थान मिल सकेगा।
भारत के मानवाधिकार आयोग में राजनीतिक हस्तक्षेप को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय परिषद् ने 2016 में इसकी ग्रेडिंग कम कर दी थी। परन्तु सरकार की आयोग के उत्थान के प्रति प्रतिबद्धता को देखते हुए 2017 में इसे ए ग्रेड प्रदान कर दिया गया था। 2018 का संशोधन अधिनियम सरकार द्वारा दिखाई गई प्रतिबद्धता का ही प्रतिफल है। वास्तव में यह अधिनियम आयोग के स्वरूप को विस्तार तो देता है, परन्तु आयोग में ठोस परिवर्तन लाने की दिशा में कोई प्रयास करता दिखाई नहीं देता।
आयोग की कमियाँ
- आयोग में सदस्यों की चयन प्रक्रिया ही त्रुटिपूर्ण है। इसके अध्यक्ष और सदस्यों का चुनाव सत्तासीन पार्टी करती है। सबसे पहले तो चयन समिति के सदस्यों को अलग-अलग क्षेत्रों से लाया जाना चाहिए।