भारत में ब्रिटिश शासन काल में 1919 और 1935 के अधिनियम के अंतर्गत जिस विधान मंडल की स्थापना की गई वह बाहरी शक्ति ब्रिटिश संसद के अधीन थे परंतु नवीन संविधान के अंतर्गत गठित भारतीय संसद किसी भी बाहरी शक्ति अधीन नहीं है आता कहा जा सकता है कि भारत की संसद संप्रभुता संपन्न विधानमंडल है किंतु उस अर्थ में सर्वोच्च और संप्रभुता संपन्न संस्था नहीं है जिस अर्थ में ब्रिटिश संसद है ब्रिटिश संसद के द्वारा ब्रिटेन के समस्त क्षेत्र और सभी विषयों के संबंध में किसी प्रकार के कानून का निर्माण किया जा सकता है और ब्रिटिश संसद द्वारा निर्मित विधि को किसी के भी द्वारा अवैध घोषित नहीं किया जा सकता परंतु भारत में किसी विधि की संवैधानिकता को इस आधार पर चुनौती दी जा सकती है-
1)- विधान की विषय वस्तु उस विधानमंडल की सा -क्षमता में नहीं है जिसने उसे पारित किया है.
2)- संविधान के प्रावधानों के प्रतिकूल अथवा किसी मूल अधिकार का उल्लंघन करती है तो भारतीय संसद ब्रिटिश संसद जैसी सर्वोच्च नहीं है साथ ही भारत की न्यायपालिका उतनी सर्वोच्च नहीं है जितनी अमेरिका की न्यायपालिका है यद्यपि स्वयं सर्वोच्च न्यायालय ने ए .के. गोपाल बनाम मद्रास राज्य के बाद (1950) में यह निर्णय दिया कि अपनी शक्तियों की विनिर्दिष्ट सीमाओं के भीतर संसद सर्वोच्च तथा निष्कर्ष निकाला जाएगा कि संविधान के द्वारा संसद की सर्वोच्चता नहीं वरन संविधान की सर्वोच्चता से संदर्भित विचार का प्रतिपादन किया गया है.