यद्यपि भारतीय संविधान में अनुसूचित जाति एवं जनजाति की कोई परिभाषा नहीं की गई है ,तथापि निम्नांकित व्यवस्था है-
1- संविधान के अनुच्छेद 341 में अनुसूचित जातियों तथा अनुच्छेद 342 में अनुसूचित जनजाति में हेतु प्रावधान किया गया है कि राष्ट्रपति प्रत्येक राज्य के राज्यपाल से परामर्श करने के पश्चात लोक अधिसूचना द्वारा ऐसे ही जातियों की प्रत्येक राज्य के लिए अलग-अलग सूचियां बनवा सकता है संसद इस सूची का पुनरीक्षण कर सकता है.
2- अनुसूचित जाति के निर्धारण का आधार जाति तथा अनुसूचित जनजाति के निर्धारण का आधार जाति एवं क्षेत्र होता है भारत की जनगणना 1931 के आधार पर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियों को अन्य जातियों से अलग स्वीकार किया गया था.
3- अनुसूचित जातियों में सामान्यतः जातियां शामिल की गई है जो आर्थिक दृष्टि से कमजोर एवं सामाजिक दृष्टि से अछूत समझी जाती रही है.
4- अनुसूचित जातियों में वे जातियां शामिल की गई हैं जो ऐसे क्षेत्रों में निवास कर रहे हैं जिनका बहुत विकास नहीं हुआ है क्योंकि उन क्षेत्रों तक सभ्यता बहुत कम पहुंच पाई है.
5- राज्य द्वारा अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के पक्ष में किए गए विशेष उपबंध ओं की विधि मान्यता पर देश के अन्य नागरिक न्यायालय में इस आधार पर हस्तक्षेप नहीं कर सकते कि वे उनके विरुद्ध विवेद कारी हैं.
6- अनुच्छेद (335) के अंतर्गत संघ, राज्य के क्रियाकलापों से संबंधित सेवाओं और पदों के लिए नियुक्तियां करने में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के दावों को प्रशासन की दक्षता बनाए रखने के लिए संगति के अनुसार ध्यान में रखा जाएगा संविधान आरक्षित स्थानों के प्रतिशत व समय सीमा का निर्धारण नहीं करता है.
7- अनुच्छेद 339 (2) के अनुसार संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार किसी राज्य के ऐसे निर्देश देने तक होगा जो उस राज्य की अनुसूचित जातियों के कल्याण के लिए निर्देश में आवश्यक बताई गई योजनाओं के बनाने का निष्पादन में है.