मानव पूंजी का विकास आवश्यक है (part 1)

बीते माह विश्व-बैंक ने मानव पूंजी सूचकांक जारी किया है, जिसके पाँच आधार रहे हैं- पाँच वर्ष तक की उम्र के बच्चों की जीवन-दर, 60 वर्ष तक के वयस्कों की जीवन-दर, बच्चों का विकास, स्कूली शिक्षा के अपेक्षित साल और शिक्षा की गुणवत्ता। 2017 के आधार पर जारी किए गए इस सूचकांक में भारत की स्थिति अफ्रीका के उप सहारा क्षेत्र से कुछ ही ऊपर और अपने पड़ोसी दक्षिण एशियाई देशों से नीचे रही है।

भारत जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाले देश के लिए मानव विकास और मानव पूंजी के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीचे जाना उचित नहीं लगता। सूचकांक पर वित्त मंत्रालय का कहना है कि ‘‘सरकार ने मानव पूंजी सूचकांक को नजरअंदाज करने और मानव पूंजी विकास कार्यक्रम की निरंतरता को बनाए रखने का निर्णय लिया है, जिससे बच्चों के जीवन की सहूलियत और गुणवत्ता को बढ़ाया जा सके।’’

इसमें कोई संदेह नहीं है कि सरकार ने देश में मानव पूंजी विकास के क्षेत्र में काम किए हैं। 2000-2001 का सर्व शिक्षा अभियान और हाल ही में चलाया गया “आयुष्मान भारत“ कार्यक्रम इसके उदाहरण हैं। इन प्रयासों से निःसंदेह लाभ हुआ है। परन्तु ये पर्याप्त नहीं हैं।

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