जीव विज्ञान - कोशिका : अर्ध्दसूत्री विभाजन - 02

जारी ..

A. प्रथम अर्ध्दसूत्री विभाजन (Meiosis I, मिओसिस I) -

इसे न्यूनकारी विभाजन भी कहते हैं या चार प्रावस्थाओं में पूरी होती है :

(a). पूर्वावस्था I (Prophase I) - यह सबसे लंबी प्रावस्था होती है जोकि पांच उप-अवस्थाओं में पूरी होती है। यह उप-अवस्थाएं हैं – (i). लेप्टोटीन, (ii). जाइगोटीन,  (iii). पैकीटीन,  (iv). डिप्लोटीन व (v). डायकाइनेसिस

(i). लेप्टोटीन की उप-अवस्था केवल कुछ घंटे चलती है इस दौरान क्रोमैटिन कुण्डलित होकर लंबे परन्तु स्पष्ट धागों (गुणसूत्रों) के रूप में दिखाई देने लगती हैं। इसमें गुणसूत्र और पतले हो जाते हैं।

(ii). जाइगोटीन - इसमें समजात गुणसूत्रों के जोड़े बन जाते हैं और लंबाई में एक-दूसरे से सट जाते हैं। यह क्रिया ‘अन्तर्ग्रन्थन’ कहलाती है, जबकि जोड़े गुणसूत्रों को युग्मित गुणसूत्र कहा जाता है।

(iii). पैकीटीन में गुणसूत्र अधिक छोटे और मोटे हो जाते हैं। युगली के दोनों समजात गुणसूत्र एक-दूसरे से लिपट जाते हैं। प्रत्येक समजात गुणसूत्र के दोनों क्रोमैटिड अब अलग-अलग दिखाई देने लगते हैं। इस प्रकार प्रत्येक युगली अब चार क्रोमैटिडों के समूह में दिखाई देने लगता है तथा चतुष्ठक कहलाता है।

(iv). डिप्लोटीन में गुणसूत्रों के चतुष्ठक अब और अधिक स्पष्ट हो जाते हैं। समजात गुणसूत्रों के बीच प्रतिकर्षण उत्पन्न हो जाता है जिसके कारण अलग-अलग होने लगते हैं। फिर भी कुछ बिंदुओं पर ये आपस में जुड़े हुए होते हैं। इन बिंदुओं को काइएज्मा कहते हैं। वास्तव में, प्रत्येक काइएज्मा वह स्थान है जहां पर समजात गुणसूत्रों के बीच क्रोमैटिड खण्डों का आदान-प्रदान होता है। इस प्रक्रिया को क्रॉसिंग ओवर कहते हैं।

(v). डायकाइनेसिस इस उप-अवस्था में प्रत्येक युगली के चारों क्रोमैटिड पृथक् होते दिखाई पड़ते हैं, परंतु फिर भी कई जगह जुड़े हुए दिखाई पड़ते हैं। एक ही गुणसूत्र के दोनों क्रोमैटिड, जिन्हें हम बंधु क्रोमैटिड कह सकते हैं, आपस में सेण्ट्रोमियर पर जुड़े होते हैं। परंतु समजात गुणसूत्र के दो विभिन्न गुणसूत्रों के क्रोमैटिड यानि कि अबंधु क्रोमैटिड आपस में काइएज्मा द्वारा जुड़े दिखाई पड़ते हैं। केन्द्रिक तथा केन्द्रक आवरण लुप्त होना शुरू हो जाते हैं। तर्कु का निर्माण शुरू हो जाता है।

(b). मध्यावस्था I (Metaphase I, मेटाफेज I) - केन्द्रिक तथा केंद्रक आवरण पूरी तरह लुप्त हो जाते हैं। तर्कु पूरी तरह से बनकर तैयार हो जाता हैं। तर्कु के मध्य रेखा पर युगली इस प्रकार व्यवस्थित हो जाते हैं कि इनके सेण्ट्रोमियर ध्रुव की ओर तथा भुजाएं मध्य रेखा की ओर होती हैं। प्रत्येक की युगली में से एक गुणसूत्र का सेण्ट्रोमियर एक ध्रुव की ओर दूसरे गुणसूत्र का सेण्ट्रोमियर दूसरे ध्रुव की ओर होता है।

(c). पश्चावस्था (Anaphase I, एनाफेज I) -  किसी भी युगली के सेण्ट्रोमियर तो विभाजित नहीं होते परंतु क्रोमैटिड पूरी तरह से अलग-अलग हो जाते हैं। तर्कु तन्तु अब सेण्ट्रोमियर को विपरीत ध्रुवों की ओर खींचते हैं। परिणामस्वरूप प्रत्येक युगली में से एक गुणसूत्र एक ध्रुव की ओर खिंच जाता है व दूसरा गुणसूत्र दूसरे ध्रुव की ओर। स्पष्ट है कि प्रत्येक युगली या समजात गुणसूत्रों के जोड़े में से एक  गुणसूत्र एक ध्रुव की ओर व दूसरा गुणसूत्र दूसरे ध्रुव की ओर चला जाता है। जिससे एक क्रोमैटिड की बजाए पूरे गुणसूत्र ही एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं। फलस्वरुप कुछ गुणसूत्रों का आधा भाग ही प्रत्येक ध्रुव पर पहुंच जाता है।

(d). अन्त्यावस्था I (Telophase I, टेलोफेज I) - प्रत्येक ध्रुव पर पहुंचे गुणसूत्रों के चारों ओर केंद्रक आवरण का पुनः निर्माण हो जाता है। 

              इसके पश्चात् कोशिका-द्रव्य कोशिका खांच द्वारा अथवा कोशिका प्लेट द्वारा विभाजित हो जाता है और दो संतति कोशिकाएं बनती हैं जिनमें जनक कोशिकाओं की तुलना में आधे गुणसूत्र होते हैं। बेहतर शब्दों में हम कह सकते हैं कि जनक कोशिकाओं में उपस्थित गुणसूत्रों के दो सेटों (2n) में से एक सेट (n) एक कोशिका में व दूसरा सेट (n)  दूसरी कोशिका में पहुंच जाता है।

      इसके बाद संतति कोशिकाएं अन्तरालाअवस्था में पहुंच जाती हैं, परंतु इसमें DNA अथवा क्रोमैटिन का द्विगुणन नहीं होता। इसके पश्चात इन दोनों कोशिकाओं में विभाजन होता है। विभाजन के इस अंतिम चरण को मिओसिस II कहते हैं।

शेष अगले नोट्स में .. 

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