इस वर्ष के प्रारंभ में ब्रूकिंस संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार भारत में गरीबी की स्थिति काफी बदल गई है। ऑनलाइन डाटाबेस के अनुसार नाइजीरिया के 8.8 करोड़ अत्यधिक गरीबों की तुलना में भारत में 6.3 करोड़ या जनसंख्या का 4.6 प्रतिशत ही अत्यधिक गरीब है। इसके अनुसार हर एक मिनट में 41 भारतीय गरीबी से छुटकारा पा रहे हैं। 2025 तक मात्र 0.5 प्रतिशत भारतीय ही बहुत ज्यादा गरीब रह जाएंगे।
भारत को यह उपलब्धि तब मिल रही है, जब विश्व के अधिकांश देशों की समृद्धि बढ़ती जा रही है। अधिकांश देशों ने गरीबी से छुटकारा पाने के मंत्र, आर्थिक विकास को अपना लिया है। अब मुक्त व्यापार, कानून का शासन, संपत्ति का अधिकार एवं उद्यमियों के लिए उपयुक्त वातावरण जैसे आर्थिक विकास के तत्व उत्तरी यूरोप एवं उत्तरी अमेरिका तक ही सीमित नहीं रहे हैं। एशिया को गरीबी मुक्त होने में मुश्किल से एक दशक का समय लगेगा। आने वाले समय में, उप-सहारा के अफ्रीकी देशों; जैसे- नाइजीरिया एवं कांगो में ही बहुत अधिक गरीबी रह जाएगी।
भारत में गरीबी उन्मूलन को लेकर एक अजीब सा विरोधाभास देखने में आता है। स्वतंत्रता के बाद के चार दशकों में लगातार एक ही दल ने राज्य किया। परन्तु विकास की दर बहुत धीमी रही। 1950 से लेकर 1980 तक भारत की आर्थिक विकास दर 3.6 प्रतिशत रही। प्रतिव्यक्ति आय 1.5 प्रतिशत प्रतिवर्ष रही। 1980 के बाद सरकारों की अस्थिरता के बीच गरीबी कम तो हुई, परन्तु 1991 के बाद वास्तविक परिवर्तन आया। उदारीकरण एवं वैश्वीकरण के साथ ही प्रतिव्यक्ति आय भी बढ़कर 4.9 प्रतिशत हो गई। 2004 के बाद से तो यह 6.1 प्रतिशत हो गई। इस अवधि में लगभग 35 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकल सके।
आखिर मजबूत सरकारों की तुलना में कमजोर सरकारों के शासनकाल में तेजी से गरीबी उन्मूलन के क्या कारण रहे ?