भारतीय गरीबी से संबंधित विरोधाभास (part 2)

स्वतंत्रता के बाद की सरकार ने मांग और पूर्ति पर आधारित बाजार अर्थव्यवस्था को अपनाने के बजाय, समाजवादी नीति को अपनाया, जहाँ नौकरशाही और उनके राजनैतिक आकाओं का ही बोलबाला रहा। नेहरु और इंदिरा गांधी; दोनों ने ही व्यापार बाधाओं, राष्ट्रीकृत निजी उद्याग, तथा अमीरों पर कर आदि को बढ़ाया। एक तरह से उन्होंने कंपनियों के व्यापार के तरीके को भी निश्चत कर दिया था। इसकी अपेक्षा अगर उन्होंने मुक्त व्यापार को बढ़ावा देने के लिए बुनियादी ढांचों को बढ़ाया होता, कानून-व्यवस्था की मजबूती, निजी उद्यमियों को प्रोत्साहन एवं कौशल विकास पर ध्यान दिया होता, तो भारत को गरीबी-उन्मूलन के लिए इतने समय का इंतजार नहीं करना पड़ता।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इन चार वर्षों में भारत समाजवाद की ओर तो नहीं जा रहा है, परन्तु विमुद्रीकरण जैसी योजनाओं से व्यापार पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। सरकार ने एक नाटकीय अंदाज में कर-इंस्पेक्टरों को लूट का अधिकार देकर एक प्रकार का कर-आतंकवाद फैला दिया है। व्यापार के मामले में उदारवादी नौकरशाहों के बजाय कर-एकत्रित करने वाले नौकरशाह आ बैठे हैं। अधिकांश देशों में वस्तु एवं सेवा कर बड़े व्यवस्थित तरीके से लगाया गया है। भारत के लिए यह एक गड़बड़झाला बना हुआ है। सरकार ने दीर्घकाल से लंबित पड़े भूमि एवं श्रम सुधारों पर कोई ध्यान नहीं दिया। न ही भारी नुकसान में चल रही सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का निजीकरण किया।

यह सच है कि हमारा देश, बहुत अधिक गरीबी की परिधि को लांघकर निरंतर विकास कर रहा है। परन्तु विश्व के अन्य देशों में बढ़ती समृद्धि की तुलना में अभी भी बहुत पिछड़ा हुआ है। सरकार को चाहिए कि वह पुरानी भूलों को नए रूप में दोहराने से बचे। आर्थिक विकास के लिए निरंतर प्रयत्न करे।

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