संविधान संशोधन संबंधी विशेष जानकारी
42 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 में निदेशक तत्वों की प्राथमिकता एवं सर्वोच्चता को मूल अधिकारों पर प्रभावी बनाया गया । उन अधिकारों पर जिनका उल्लेख अनुच्छेद 14, 19 एवं 31 में है । हालांकि इस विस्तार को उच्चतम न्यायालय द्वारा मिनर्वा मिल्स मामले 1980 में असंवैधानिक एवं अवैध घोषित कर दिया गया लेकिन अनुच्छेद 14 एवं अनुच्छेद 19 द्वारा स्थापित मूल अधिकारों को 39 (ख) और (ग) में बताए गए निदेशक तत्व के अधीनस्थ माना गया । अनुच्छेद 31 संपत्ति का अधिकार जो 44 वें संशोधन अधिनियम 1978 द्वारा समाप्त कर दिया गया ।
राष्ट्रपति की शक्ति से संबंधित संविधान संशोधन -
24 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1971 के द्वारा संविधान संशोधन करने के विधेयक को वीटो करने की राष्ट्रपति की शक्ति को छीन लिया गया । संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित संविधान विधेयक को राष्ट्रपति को सहमति देनी होगी ।
संविधान संशोधन विधेयक-
संसद की संविधान संशोधन की शक्ति और उसके लिए प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 368 में वर्णित है । अनुच्छेद 368 के अनुसार संविधान संशोधन विधेयक का भारतीय संसद के दोनों सदनों द्वारा अलग-अलग विशेष बहुमत से पारित होना आवश्यक है । अर्थात कुल सदस्यों के आधे से अधिक और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत से इसका पारित होना आवश्यक है ।
संविधान संशोधन की पहल:-
भारत के संविधान में संशोधन की प्रक्रिया को संसद के किसी भी एक सदन में आरंभ किया जा सकता है । इसका उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 368 (2) में किया गया किंतु संशोधन की प्रक्रिया के लिए दोनों सदनों के सदस्यों के बहुमत की आवश्यकता होती है । मतदान की दशा में प्रत्येक सदन में उपस्थित सदस्यों की संख्या के दो तिहाई द्वारा संशोधन प्रस्ताव की स्वीकृति अनिवार्य होती है । भारत के संविधान में संशोधन की प्रक्रिया को दक्षिण अफ्रीका के संविधान से लिया गया है ।
अर्थात
अनुच्छेद 368 (2) के तहत संविधान के संशोधन हेतु विधेयक संसद के दोनों सदनों में से किसी एक (लोकसभा या राज्यसभा) में प्रस्तुत किया जा सकता है ।
भारतीय संविधान नम्य एवं परिवर्तनशील है । इसमें आवश्यकतानुसार संविधान के अनुच्छेद 368 में दी गई प्रक्रिया के अनुसार संशोधन किया जा सकता है । भारतीय संविधान में तीन प्रकार से संशोधन किया जा सकता है -
१. साधारण बहुमत द्वारा:-
संविधान में कुछ ऐसे अनुच्छेद हैं जिन्हें संसद साधारण रूप से संशोधित कर सकती है। इस प्रकार के संशोधन को संविधान संशोधन नहीं माना जाता । जैसे - राज्यों के नाम तथा सीमा में परिवर्तन करने अथवा नए राज्यों का निर्माण करने, राज्यों में विधान परिषदों को गठित करने या समाप्त करने, राष्ट्रपति, राज्यपालों, उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के वेतनों में वृद्धि या कमी करने वाले संशोधन साधारण बहुमत से किए जाते हैं ।