कागज आधुनिक सभ्यता का मूल आधार है ,कागज निर्माण की कला का विकास सबसे पहले चीन में संभवत 300 ईसा पूर्व में हुआ था भारत में कागज का निर्माण अति प्राचीन काल से कुटीर उद्योग के रूप में किया जा रहा है जिसके प्रमुख केंद्र कालपी मथुरा सांगानेर तथा अरवल में थे| देश में कागज का प्रथम आधुनिक कारखाना 1832 में श्रीरामपुर पश्चिम बंगाल में स्थापित किया गया किंतु यह प्रयास विफल रहा भारत में कागज उद्योग का प्रथम कारखाना 1867 में बालीगंज (कोलकाता) में लगाया गया |उत्तर प्रदेश में प्रथम कारखाना 1879 में लखनऊ में लगाया गया था |भारत 2010 के अनुसार देश में 700 से अधिक लोग दी और कागज मिले थे जिन जिन में करीब 6300000 टन कागज और गत्ते पेपर बोर्ड तथा 14.4 लाखन अखबारी कागज का निर्माण होता था भारत की प्रति व्यक्ति कागज की खपत 7.2 किलोग्राम है ,जो 50 किलोग्राम प्रति व्यक्ति की औसत से काफी कम है वर्तमान में भारत कागज उद्योग विश्व के कागज उत्पादक देशों में 15 स्थान पर है|
100000 टन कागज उत्पादन के लिए लगभग 22 टन कच्चे माल की जरूरत होती है| अतः इस उद्योग का स्थानीयकरण कच्चे माल के क्षेत्रों में ही हुआ है कागज माल की 70% आवश्यकताओं की पूर्ति बांस से, 15% सवाई घास से ,7% गन्ने की खोई से, 5% मुलायम लकड़ी से, एवं 3% चावल से, गेहूं और मक्के की पुआल ,रद्दी कागज, रद्दी कपड़े यूके लिप्टस हुआ फोपनार के पौधे से होती है पहले कागज उद्योग के सबसे अधिक कारखाने पश्चिम बंगाल राज्य में थे जहां टीटागढ़ , नैहाटी, त्रिवेणी ,बड़ानगर ,बागोरिया आदि प्रमुख केंद्र हैं वर्तमान में कागज के सर्वाधिक कारखाने महाराष्ट्र में स्थित हैं |मध्यप्रदेश में नेपानगर में अखबारी कागज तथा होशंगाबाद में नोट छपने के कागज बनाने का सरकारी कारखाना है| 1994 से अखबारी कागज क्षेत्र को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया गया तब से 36 कारखाने जो अधिकांश होता है लघु पैमाने के क्षेत्र में हैं अखबारी कागज विनिर्माण में संलग्न है ,फिर भी कागज का उत्पादन घरेलू मांग को पूरा करने में अपर्याप्त है अतः मांग को पूरा करने के लिए कागज को विदेशों से आयात कराना पड़ता है|