जीव विज्ञान - कोशिका : अर्ध्दसूत्री विभाजन - 03

जारी...

B. द्वितीय अर्ध्दसूत्री विभाजन (Meiosis II, मिओसिस II) -

यह अर्ध्दसूत्री विभाजन प्रथम के पूरा होने के बाद शुरू होता है। दोनों के बीच की अवस्था ‘विरामावस्था’ कहलाती है। इस चरण में निम्नलिखित चार प्रावस्थाएं होती हैं :

(a). पूर्वावस्था II (Prophase II, प्रोफेज II) - क्रन्द्रिक तथा केंद्रक आवरण विघटित हो जाते हैं। क्रोमैटिड सिकुड़कर छोटे व मोटे होने लगते हैं। प्रत्येक गुणसूत्र के दोनों क्रोमैटिड लंबाई में अलग-अलग हो जाते हैं- केवल सेण्ट्रोमियर पर जुड़े रहते हैं। क्रोमैटिड इस तरह व्यवस्थित हो जाते हैं कि उनके अक्ष प्रथम अर्धसूत्री विभाजन की तर्कु के लंब कोण पर स्थित हो।

(b). मध्यावस्था II (Metaphase II, मेटाफेज II) - अवस्था में केंन्द्रिका एवं केंद्रक झिल्ली लुप्त हो जाती है। तर्कु बन जाती है और गुणसूत्र तर्कु के मध्य रेखा पर सेण्ट्रोमियर द्वारा चिपक जाते हैं।

(c). पश्चावस्था II (Anaphase II, एनाफेज II) - सेण्ट्रोमियर पूरी तरह विभाजित हो जाते हैं। फलस्वरुप प्रत्येक गुणसूत्र के दोनों क्रोमैटिड पूरी तरह से एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं। यह पृथक् क्रोमैटिड जोकि अब स्वतंत्र रूप से गुणसूत्र बन जाते हैं, तर्कु तन्तुओं द्वारा विपरीत ध्रुवों की ओर खींच लिए जाते हैं। इस प्रकार  गुणसूत्रों के दो अलग-अलग समूह बन जाते हैं।

(d). अन्त्यावस्था I(Telophase II, टेलोफेज II) - इसमें ध्रुवों पर स्थित गुणसूत्रों के चारों ओर केन्द्रिकीय झिल्ली का निर्माण हो जाता है। एक अगुणित केंद्रक से चार अगुणीत केंद्रक बन जाते हैं। तत्पश्चात् कोशिका द्रव्य का विभाजन होता है और एक कोशिका से दो कोशिकाओं का निर्माण हो जाता है।

           इस प्रकार मिओसिस के फलस्वरूप एक जनक कोशिका से चार संतति कोशिकाएं बनती हैं जिनके अंदर गुणसूत्रों की संख्या जनक कोशिका की तुलना में आधी होती है। यही नहीं, चारों संतति कोशिकाओं के लक्षण एक-दूसरे से तथा जनक कोशिका से भिन्न होते हैं।

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