जीन विनिमय (Crossing over) -
“अर्ध्दसूत्री विभाजन के दौरान सूत्रयुग्मन के बाद समजात गुणसूत्रों के क्रोमैटिडों (अर्ध्दसूत्रों) व दूसरे गुणसूत्रों के क्रोमैटिडों के बीच हिस्सों का वास्तविक आदान-प्रदान ही जीन विनियम कहलाता है।“
जीन विनियम के फलस्वरूप विभिन्न प्रकार के पुनर्योगज़ों की उत्पत्ति होती है। मान लीजिए कि किसी एक जनक कोशिका में समजात गुणसूत्रों के जोड़ों में से एक पर जीन A, B, C हैं व दूसरे पर a, b, c; इसमें जब अर्ध्दसूत्री विभाजन होता है तो प्रोफेज के दौरान काइएज्मा बनता है और अबंधु क्रोमैटिडों के बीच गुणसूत्र खंडों का आदान-प्रदान होता है तो संतति कोशिकाओं में दो नए प्रकार के गुणसूत्र Abc व aBC बनेंगे। जब इन गुणसूत्रों के वियोजन से संतति कोशिकाएं बनेंगी तो दो नई प्रकार की कोशिकाएं बनेंगी - (i). जिनमें जीन Abc होंगे तथा (ii).जिनमें जीन aBC होंगे। अतः इन दोनों कोशिकाओं से विकसित होने वाले जीवों के लक्षण जनक कोशिका से कुछ भिन्न होंगे यही नहीं, दोनों संतानों के लक्षण काफी मिलते होंगे परन्तु थोड़ी बहुत विभिन्नता आपस में जरूर होगी। इसलिए एक ही माता-पिता की संतानें आपस में काफी समानता रखती है, परंतु फिर भी उनमें अंतर देखने को मिलते हैं। यही अंतर ‘विविधता’ कहलाते हैं। किसी भी जीव जाति के अस्तित्व में बने रहने हेतु ये विविधाएं काफी महत्वपूर्ण हैं। जितनी अधिक विविधता किसी जीव-जाति में होती है, प्र्यावरण में होने वाले परिवर्तनों को झेलने की क्षमता उनमें उतनी अधिक होती है।