मौर्योत्तर कालीन भारतीय राजवंश से संबंधित जानकारी। भाग2

शक चारागाह की खोज में लोग भारत आए थे भारत या मुख्य था 5 शाखाओं में आए जब एवं भारत आए तो उज्जैन के एक शासक ने 58 ईसा पूर्व में युवाओं को भारत से खदेड़ दिया और इसके उपलक्ष में 57 ईसा पूर्व में उसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की और 57 ईसा पूर्व में ही उसने एक नया संवत विक्रम संवत 57 ईसा पूर्व में चलाया शकों का सबसे प्रतापी राजा रुद्रदामन ताजा संस्कृत भाषा का प्रेमी तक भारत में कौन है क्षेत्र की उपाधि धारण करना आरंभ कर दिया।

पहला भारत में इसका संस्थापक गोंडोफेयरनेस को माना जाता है भारत में इन की राजधानी तक्षशिला में थी।

कुशाल या मद्धेशिया के यूजिक अभी लेकर थे भारत में इनका संस्थापक कुछ प्लस कट पीसेज को माना जाता है भारत में कुल डिसीसिस में तांबे के सिक्के जारी किए थे इस का उत्तराधिकारी स्वयं कैडफि आस्था था।

कनिष्का कनिष्का जब राजगद्दी पर बैठा तो उसने एक नया समूह शक संवत 786 में चलाया इसे संवत को भारत सरकार द्वारा अपनाया गया है किसानों की राजधानी में पेशावर पुरुषपुर और मथुरा थी पार्षद ने कहा कहने पर कनिष्क ने कश्मीर के कुंडल वन में चतुर्थ बौद्ध संगीत समिति का आयोजन किया था इसका अध्यक्ष अश्वघोष और वसुमित्र था और उसने आयुर्वेद पर चरक संहिता नामक ग्रंथ में लिखा था काल में मथुरा गंधार शैली का पूरी तरह से विकास हुआ था राजस्थान में अपनी राजधानी पेशावर में 1 मीटर में नागार्जुन रहा करते थे जिन्हें माना जाता है नागार्जुन भारत में भी माना जाता है भारत में सबसे अधिक तांबे का सिक्का जारी करने वाले कुषाण थे

गुप्तकाल मोर वंश के पतन के बाद एक लंबे समय तक भारत की राजनीतिक एकता खंडित रही इसी समय भारत में कई विदेशी शक्तियां भारत आई और इसी समय भारत में कई जगह पर छोटे-छोटे राजवंशों का उदय हुआ और इसी समय पूरी भारत में कौशांबी के आसपास गुप्त वंश का उदय होता दिखाई देता है
गुप्तों कोजानने के स्रोतों का इतिहास जानने के लिए अगले 1 सिक्के और साहित्य साहित्य में पुराण देवीचंद्रगुप्तम विशाखदत्त विशाखा दत्त और काम आनंद का नीतिशास्त्र कालिदास के ग्रंथ और विदेशियों का विवरण प्रमुख है 200 69 ईसवी में श्री गुप्त गुप्त वंश की स्थापना की और महाराज के उपाय धारण किया तथा इसके इसका ने मिट्टी की मुहर स्नेह मिट्टी की मुहर भी जारी किया था उसका उत्तराधिकारी घटोत्कच था और इसने भी महाराज की पद धारण किया
चंद्रगुप्त फर्स्ट 319 इसमें से 350 वित्त गुप्त वंश का पहला शासक था जिसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण किया था 319 320 ईस्वी में जब या गुप्त वंश की राजगद्दी पर बैठा तो उसने एक नया संवत चलाया जिसको हम गुप्त संवत के नाम से जानते हैं पूरी भारत में अपने राज्य को स्थान दिलाने के लिए उसने कुमार देवी से विवाह किया है इसके साम्राज्य का विस्तार यूपी और बिहार के बीच खेला था राजा रानी प्रकार के सिक्के चलवाए।

समुद्रगुप्त 350 से 375 ईसवी तक उसकी जानकारी हमें प्रयाग प्रशस्ति से मिलती है जिसकी रचना परिषद ने की थी प्रयाग प्रशस्ति गद्य एवं पद्य में लिखा गया है समुद्रगुप्त विष्णु का उपासक था या संगीत प्रेमी कविराज और असमय करता था या विक्रम आंत के उपाय धारण करता था या वीणा वादक प्रकार असम में करता के प्रकार का सिक्का जारी किया था इसमें उत्तर भारत के 9 राज्यों तथा अधिक जातियों तथा दक्षिण भारत के 12 राजाओं को पूर्ण मोक्ष अनुग्रह की नीति अपनाई समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा जाता है।
चंद्रगुप्त सेकंड 375 एपिसोड 415 अभी तक चंद्रगुप्त सेकंड को विक्रमादित्य के नाम से भी जाना जाता है इस की माता का नाम दत देवी था जिसने अपने साम्राज्य का विस्तार करने के लिए मजबूर वैवाहिक संबंध बनाए इसमें अपना विवाह कुबेर नागा से किया और इस में उत्पन्न उत्तरी प्रभावती का विवाह वाकाटक नरेश से किया है इस के समय में चीनी यात्री फाह्यान आया था फैजान ने भारत पर एक ग्रंथ था क्योंकि लिखा था चंद्रगुप्त सेकंड चांदी के सिक्के चलते थे दिल्ली का महरौली स्तंभ चंद्रगुप्त के दरबार में नवरत्न रहा करते थे कालिदास धन्वंतरि छपरा अमर सिंह वाराणसी आदि प्रमुख थे।
कुमारगुप्त प्रथम 415 से 450 विद्या किसने महेंद्रादित्य के नाम से भी जानते हैं इसकी माता मां का नाम दूं देवी था इसने नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की या वैष्णव धर्म अनुयाई था इसने यज्ञ करवाया।
स्कंद गुप्त 455 से 467 गुप्त वंश का अंतिम शासक था जिसने घोड़ों को पराजित किया था इसने सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण करवाया और सौराष्ट्र में पांडे दर्द को अपना गवर्नर बनाया था गुप्त वंश का अंतिम शासक भानु गुप्त था।
गुप्त वंश का प्रशासन गुप्तकाल में सबसे बड़ी प्रशासनिक इकाई देश है जिसका प्रशासनिक गुप्ता कहलाता था देश के व्यक्तियों में बटा हुआ था या प्रदेश अधिकारियों के समान था जिसका प्रमुख ऊपर एक होता था कि को विषय में बांटा गया था और विषय प्रमुख विषय पत्ती कहलाता था पुलिस विभाग का प्रमुख दंड पासी कहलाता था तथा पुलिस विभाग कर्मचारी चार्ट या भाट कहलाते थे प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम देवरी ग्राम प्रधान ग्राम समूह को कई पारित किया गया था।
भूमिया भू राजस्व प्रशासन गुप्त काल में भूमि कर 14 से 16 भाग से लिया जाता था गुप्तकाल में के प्रकार की भूमि का उल्लेख आता है क्षेत्र खेती योग्य भूमि वास्तु निवास करने योग्य भूमि भूमि बंजर भूमि अंकल कीचड़ वाली भूमि आप राहत बिना ज्योति जंगली भूमि सिंचाई के लिए गुप्त काल में नए का प्रयोग किया जाता था उज्जैन उस समय व्यापार वाणिज्य का प्रमुख केंद्र था और यह भक्तों की वित्तीय राजधानी भी थी व्यापार वाणिज्य करने वालों को श्रेणी कहा जाता था और इनका प्रमुख जेष्ठता था व्यापार वाणिज्य कौड़ियों के माध्यम से होता था इस समय सोने के सिक्कों का प्रचलन व्यापार वाणिज्य में होता था सोने के सिक्के भारत में सबसे पहले सोने का सिक्का जारी किया इसके बाद कुछ और उन्हें भी सोने के सिक्के चलाए गुप्त कौन है सबसे भारी सोने के सिक्के चलाए चंद्रगुप्त द्वितीय के सिक्के सबसे भारी थे परंतु उसमें मिलावट चांदी की की जाती थी गुप्तकाल में है कायस्थों का सर्वप्रथम वर्णन याज्ञवल्क्य स्मृति और जाट का वर्णन किया गया है 510 का एक एरण अभिलेख में सती प्रथा का उल्लेख आता है गुप्त शासक परम भागवत की उपाधि धारण करते थे तथा राष्ट्र बनाने की कला का विकास हुआ गुप्त काल केगुप्त काल में प्रत्येक क्षेत्र में विकास हुआ इसलिए प्राचीन भारतीय इतिहास में गुप्त काल को स्वर्ण काल के नाम से जाना जाता है गुप्त काल में ही सामंतवाद का उदय भी होता है सर्वाधिक प्रसिद्ध मंदिर देवगढ़ का दशावतार मंदिर और मंदिर भीतरगांव का मंदिर शिव मंदिर भूमरा आदि प्रमुख है अजंता गुफा की गुफा संख्या 1670 गुप्त काल के हैं गुफा संख्या 16 में मरणासन्न राजकुमारी को दिखाया गया है और गुफा संख्या 17 गौतम बुध से संबंधित है
गुप्त काल में प्रयोग की प्राचीन काल के चरम पर थी उसी समय गुप्तकाल में आर्यभट्ट ने आर्य भक्ति एवं सूर्य सिद्धांत नामक ग्रंथ नामक ग्रंथ लिखे और आर्यभट्ट ने सबसे पहले बताया कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है चंद्रगुप्त द्वितीय के समय हमारा में धनवंतरी और ब्रह्मगुप्त जैसे महान विद्वान रहा करते थे याज्ञवल्क्य स्मृति नारद स्मृति कात्यायन स्मृति एवं बृहस्पति स्मृति काल में हुई गुप्त काल में प्रत्येक क्षेत्र में विकास हुआ इसीलिए प्राचीन भारतीय इतिहास में गुप्त काल को स्वर्ण काल के नाम से जाना जाता है कि तत्काल में सामंतवाद का उदय भी होता है।
थानेश्वर कापुस स्मूथ पुष्यभूति वंश गुप्त वंश के पतन के बाद हरियाणा के अंबाला जिले के थानेश्वर नामक स्थान पर नर वर्धन ने इस वंश की स्थापना के 23 वर्ष की जानकारी प्रियदर्शिका रत्नावली नागानंद तथा बाणभट्ट हर्षचरित से मिलती है नरवर धन का उत्तराधिकारी प्रभाकर वर्धन था जिसके दो पुत्र राजवर्धन एवं हर्षवर्धन तथा एक पुत्री राज्यश्री का विवाह मौखरी वंश का शासक था लेकिन इसकी हत्या शशांक जो गौड़ वंश का शासक था जिसने कर दिया तत्पश्चात जब राज्यवर्धन बदला लेने हेतु बंगाल की तरफ बढ़ा तो धोखे से हत्या कर दी गई में वर्धन वंश का सबसे महान शासक ने अपनी राजधानी बनाया था यात्रियों का राजकुमार के नाम से भी जाना जाता है वंशम भारत में नालंदा विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण किया था।
हर्ष को शिलादित्य एवं परम भट्ठारक नाम से भी जाना जाता है इसमें 630 ईसवी में दक्षिण के साथ सर्कुलेटिंग चालू कौन से एक युद्ध लड़ा था जिसने 643 ईसवी में कन्नौज तथा प्रयाग में दो विशाल धार्मिक सभाओं का आयोजन किया था तथा प्रयाग में आयोजित सभा को मोच परिषद के नाम से भी जाना गया हर सपना शासक शासन एक मंत्रिपरिषद से चलाया था इसके कान में साधारण सैनिकों को चाटबॉट कहा जाता था हर एक धार्मिक व्यक्ति था वह प्रतिदिन 500 ब्राह्मणों एवं 1000 बच्चों को भोजन कराया करता था जब हर से 606 भी में राजगद्दी प्राप्त किया था उसने एक नया संवत भी चलाया था जिसको हर्ष संवत के नाम से भी जानते हैं।

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