आधुनिक विश्व के इतिहास में कई बार सर्वोच्च नेताओं ने ऐसी घोषणाएं की हैं, जो असंभव सी प्रतीत होती रहीं, परन्तु अंततः साकार हुईं। 2014 में भारतीय प्रधानमंत्री की भारत को 2019 तक खुले में शौचमुक्त करने की घोषणा भी असंभव प्रतीत होने वाला कार्य लगती थी। 60 करोड़ भारतीयों की आदत को सुधारकर उन्हें शौचालयों के निर्माण के लिए तैयार करना, कोई आसान कार्य नहीं था। आज, इस घोषणा के चार वर्ष बाद ही भारत, खुले में शौच से मुक्त होने के कगार पर है।
कभी-कभी किसी शक्तिशाली द्वारा दिखाई गई प्रतिबद्धता से, सुप्त लोगों और संस्थाओं को पहले भी जाग्रत होते देखा गया है। स्वच्छ भारत मिशन में भी यही हुआ है। भारत की स्वतंत्रता के 67 वर्षों बाद, यानी 2014 तक भी शौचालय को एक आवश्यकता नहीं माना गया था। महिलाओं को इसकी जरूरत लगती थी, परन्तु उनकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं था।
विश्व की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में अपना स्थान बना लेने के बाद भारत के लिए अपनी जनता, विशेष रूप से ग्रामीण जनता के जीवन-स्तर को ऊपर उठाना जरूरी है। इस यात्रा में बुनियादी ढांचों के विकास के साथ ही स्वच्छता भी बहुत मायने रखती है। शौचालयों के अभाव में महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा तो दांव पर लगी ही थी, हमारे शिशुओं और बच्चों के लिए यह प्राणघातक भी था। इससे फैलने वाली अनेक बिमारियों ने बच्चों के विकास को अवरुद्ध कर दिया था। इससे देश की उत्पादकता प्रभावित हो रही थी, और हम अपने प्रजातांत्रिक लाभांश को भुना नहीं पा रहे थे।