चन्द्रयान

चन्द्रयान अथवा चंद्रयान-1 भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के चंद्र अन्वेषण कार्यक्रम के अंतर्गत द्वारा चंद्रमा की तरफ कूच करने वाला भारत का पहला अंतरिक्ष यान था। इस अभियान के अन्तर्गत एक मानवरहित यान को 22 अक्टूबर, 2008 को चन्द्रमा पर भेजा गया और यह 30 अगस्त, 2009 तक सक्रिय रहा। यह यान ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचन यान (पोलर सेटलाईट लांच वेहिकल, पी एस एल वी) के एक संशोधित संस्करण वाले राकेट की सहायता से सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से प्रक्षेपित किया गया। इसे चन्द्रमा तक पहुँचने में 5 दिन लगे पर चन्द्रमा की कक्षा में स्थापित करने में 15 दिनों का समय लग गया। चंद्रयान का उद्देश्य चंद्रमा की सतह के विस्तृत नक्शे और पानी के अंश और हीलियम की तलाश करना था। चंद्रयान-प्रथम ने चंद्रमा से 108 किमी ऊपर 525 किग्रा का एक उपग्रह ध्रुवीय कक्षा में स्थापित किया। यह उपग्रह अपने रिमोट सेंसिंग (दूर संवेदी) उपकरणों के जरिये चंद्रमा की ऊपरी सतह के चित्र भेजे।

भारतीय अंतरिक्षयान प्रक्षेपण के अनुक्रम में यह २७वाँ उपक्रम था। इसका कार्यकाल लगभग २ साल का होना था, मगर नियंत्रण कक्ष से संपर्क टूटने के कारण इसे उससे पहले बंद कर दिया गया। चन्द्रयान के साथ भारत चाँद को यान भेजने वाला छठा देश बन गया था। इस उपक्रम से चन्द्रमा और मंगल ग्रह पर मानव-सहित विमान भेजने के लिये रास्ता खुला।

हालाँकि इस यान का नाम मात्र चंद्रयान था, किन्तु इसी शृंखला में अगले यान का नाम चन्द्रयान-2 होने से इस अभियान को चंद्रयान-1 कहा जाने लगा।

तकनीकी जानकारी:-

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र 'इसरो' के चार चरणों वाले 316 टन वजनी और 44.4 मीटर लंबे अंतरिक्ष यान चंद्रयान प्रथम के साथ ही 11 और उपकरण एपीएसएलवी-सी11 से प्रक्षेपित किए गए जिनमें से पाँच भारत के और छह अमरीका और यूरोपीय देशों के थे। इस परियोजना में इसरो ने पहली बार 10 उपग्रह एक साथ प्रक्षेपित किए।

द्रव्यमान - प्रक्षेपण के समय 1380 किलोग्राम और बाद में चन्द्रमा तक पहुँचने पर इसका वजन 575 किग्रा हो जाएगा। अपने इम्पैक्टरों को फेंकने के बाद 523 किग्रा।

आकार- एक घन के आकार में जिसकी भुजाए 1.5 मीटर लम्बी हैं।

संचार- एक्स-बैंड

ऊर्जा- ऊर्जा का मुख्य स्रोत सौर पैनल है जो 700 वाट की क्षमता का है। इसे लीथियम-आयन बैटरियों में भर कर संचित किया जा सकता है।

अध्ययन के विशिष्ट क्षेत्र:-

•स्थायी रूप से छाया में रहने वाले उत्तर- और दक्षिण-ध्रुवीय क्षेत्रों के खनिज एवं रासायनिक इमेजिंग।

•सतह या उप-सतह चंद्र पानी-बर्फ की तलाश, विशेष रूप से चंद्र ध्रुवों पर।

•चट्टानों में रसायनों की पहचान।

•दूरसंवेदन से और दक्षिणी ध्रुव एटकेन क्षेत्र (एसपीएआर) के द्वारा परत की रासायनिक वर्गीकरण, आंतरिक सामग्री की इमेजिंग।

•चंद्र सतह की ऊंचाई की भिन्नता का मानचित्रण करना।

•10 केवी से अधिक एक्स-रे स्पेक्ट्रम और 5 मी (16 फुट) रिज़ॉल्यूशन के साथ चंद्रमा की सतह के अधिकांश स्टेरिओग्राफिक कवरेज का निरीक्षण।

•चंद्रमा की उत्पत्ति और विकास को समझने में नई अंतर्दृष्टि प्रदान करना।

घटनाक्रम:-

बुधवार 22 अक्टूबर 2008 को छह बजकर 21 मिनट पर श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से चंद्रयान प्रथम छोड़ा गया। इसको छोड़े जाने के लिए उल्टी गिनती सोमवार सुबह चार बजे ही शुरू हो गई थी। मिशन से जुड़े वैज्ञानिकों में मौसम को लेकर थोड़ी चिंता थी, लेकिन सब ठीक-ठाक रहा। आसमान में कुछ बादल जरूर थे, लेकिन बारिश नहीं हो रही थी और बिजली भी नहीं चमक रही थी। इससे चंद्रयान के प्रक्षेपण में कोई दिक्कत नहीं आयी। इसके सफल प्रक्षेपण के साथ ही भारत दुनिया का छठा देश बन गया है, जिसने चांद के लिए अपना अभियान भेजा है। इस महान क्षण के मौके पर वैज्ञानिकों का हजूम 'इसरो' के मुखिया जी माधवन नायर 'इसरो' के पूर्व प्रमुख के कस्तूरीरंगन के साथ मौजूद थे। इन लोगों ने रुकी हुई सांसों के साथ चंद्रयान प्रथम की यात्रा पर सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लगातार नजर रखी और एक महान इतिहास के गवाह बने।

चंद्रयान के ध्रुवीय प्रक्षेपण अंतरिक्ष वाहन पीएसएलवी सी-11 ने सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से रवाना होने के 19 मिनट बाद ट्रांसफर कक्षा में प्रवेश किया। 11 पेलोड के साथ रवाना हुआ चंद्रयान पृथ्वी के सबसे नजदीकी बिन्दु (250 किलोमीटर) और सबसे दूरस्थ बिन्दु (23, 000 किलोमीटर) के बीच स्थित ट्रांसफर कक्षा में पहुंच गया। दीर्घवृताकार कक्ष से 255 किमी पेरिजी और 22 हजार 860 किमी एपोजी तक उठाया गया था।

गुरुवार 23 अक्टूबर 2008 को दूसरे चरण में अंतरिक्ष यान के लिक्विड इंजिन को 18 मिनट तक दागकर इसे 37 हजार 900 किमी एपोजी और 304 किमी पेरिजी तक उठाया गया।

शनिवार 25 अक्टूबर 2008 को तीसरे चरण के बाद कक्ष की ऊंचाई बढ़ाकर एपोजी को दोगुना अर्थात 74 हजार किमी तक सफलतापूर्वक अगली कक्षा में पहुंचा दिया गया। इसके साथ ही यह 36 हजार किमी से दूर की कक्षा में जाने वाला देश का पहला अंतरिक्ष यान बन गया।

सोमवार 28 अक्टूबर 2008 को चंद्रयान-1 ने सुबह सात बज कर आठ मिनट पर कक्षा बदलनी शुरू की। इसके लिए यान के 440 न्यूटन द्रव इंजन को साढ़े नौ मिनट के लिए चलाया गया। इससे चंद्रयान-1 अब पृथ्वी से काफी ऊंचाई वाले दीर्घवृत्ताकार कक्ष में पहुंच गया है। इस कक्ष की पृथ्वी से अधिकतम दूरी 164,600 किमी और निकटतम दूरी 348 किमी है।

बुधवार 29 अक्टूबर 2008 को चौथी बार इसे उसकी कक्षा में ऊपर उठाने का काम किया। इस तरह यह अपनी मंजिल के थोड़ा और करीब पहुंच गया है। सुबह सात बजकर 38 मिनट पर इस प्रक्रिया को अंजाम दिया गया। इस दौरान 440 न्यूटन के तरल इंजन को लगभग तीन मिनट तक दागा गया। इसके साथ ही चंद्रयान-1 और अधिक अंडाकार कक्षा में प्रवेश कर गया। जहां इसका एपोजी (धरती से दूरस्थ बिंदु) दो लाख 67 हजार किमी और पेरिजी (धरती से नजदीकी बिंदु) 465 किमी है। इस प्रकार चंद्रयान-1 अपनी कक्षा में चंद्रमा की आधी दूरी तय कर चुका है। इस कक्षा में यान को धरती का एक चक्कर लगाने में करीब छह दिन लगते हैं। इसरो टेलीमेट्री, ट्रैकिंग एंड कमान नेटवर्क और अंतरिक्ष यान नियंत्रण केंद्र, ब्यालालु स्थित भारतीय दूरस्थ अंतरिक्ष नेटवर्क एंटीना की मदद से चंद्रयान-1 पर लगातार नजर रखी जा रही है। इसरो ने कहा कि यान की सभी व्यवस्थाएं सामान्य ढंग से काम कर रही हैं। धरती से तीन लाख 84 हजार किमी दूर चंद्रमा के पास भेजने के लिए अंतरिक्ष यान को अभी एक बार और उसकी कक्षा में ऊपर उठाया जाएगा।

शनिवार 8 नवंबर 2008 को चन्द्रयान भारतीय समय अनुसार करीब 5 बजे सबसे मुश्किल दौर से गुजरते हुए चन्दमाँ की कक्षा में स्थापित हो गया। अब यह चांद की कक्षा में न्यूनतम 504 और अधिकतम 7502 किमी दूर की अंडाकार कक्षा में परिक्रमा करगा। अगले तीने-चार दिनों में यह दूरी कम होती रहेगी।

शुक्रवार 14 नवंबर 2008 वैज्ञानिक उपकरण मून इंपैक्ट प्रोब (एमआईपी) को चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्र में शाकेल्टन गड्ढे के पास छोड़ दिया। एमआईपी के चारों ओर भारतीय ध्वज चित्रित है। यह चांद पर भारत की मौजूदगी का अहसास कराएगा।

शनिवार 29 अगस्त 2009 चंद्रयान-1 का नियंत्रण कक्ष से संपर्क टूट गया।

रविवार 30 अगस्त 200, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने चंद्रयान प्रथम औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया।

चंद्र पानी की खोज:-

24सितंबर 2009 को साइंस (पत्रिका) ने बताया कि चंद्रयान पर चंद्रमा खनिजोग्य मैपर (एम 3) ने चंद्रमा पर पानी की बर्फ होने की पुष्टि की है।

सदी की सबसे महान उपलब्धि:-

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन [इसरो] ने दावा किया कि चांद पर पानी भारत की खोज है। चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी का पता चंद्रयान-1 पर मौजूद भारत के अपने मून इंपैक्ट प्रोब [एमआईपी] ने लगाया। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के उपकरण ने भी चांद पर पानी होने की पुष्टि की है। चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी का पता भारत के अपने एमआईपी ने लगाया है। चंद्रयान-1 के प्रक्षेपण के करीब एक पखवाड़े बाद भारत का एमआईपी यान से अलग होकर चंद्रमा की सतह पर उतरा था। उसने चंद्रमा की सतह पर पानी के कणों की मौजूदगी के पुख्ता संकेत दिए थे। चंद्रयान ने चांद पर पानी की मौजूदगी का पता लगाकर इस सदी की महत्वपूर्ण खोज की है। इसरो के अनुसार चांद पर पानी समुद्र, झरने, तालाब या बूंदों के रूप में नहीं बल्कि खनिज और चंट्टानों की सतह पर मौजूद है। चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी पूर्व में लगाए गए अनुमानों से कहीं ज्यादा है।

आंकड़े का सार्वजनिक प्रदर्शन:-

चंद्रयान-1 द्वारा इकट्ठा किए गए आंकड़े वर्ष 2010 के अंत तक जनता के लिए उपलब्ध कराए गए थे। आंकड़े को दो सत्रों में विभाजित किया गया था जिसमें पहले सत्र 2010 के अंत तक सार्वजनिक हो गया था और दूसरा सत्र 2011 के मध्य तक सार्वजनिक हो गया था। आंकड़ो में चंद्रमा की तस्वीरें और चंद्रमा की सतह के रासायनिक और खनिज मानचित्रण के आंकड़े शामिल हैं।

चंद्रयान-2

मुख्य लेख: चंद्रयान-2

इसरो वर्तमान में चंद्रयान-2 नामक एक दूसरे संस्करण पर काम कर रही है। जिसे 2018 में लॉन्च किया जा सकता है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) अपने दूसरे चंद्रयान मिशन के हिस्से के रूप में एक रोबोट रोवर को शामिल करने की योजना बना रहा है। चंद्रमा की सतह पर पहियों पर चलने के लिए रोवर डिजाइन किया जाएगा। रोवर ऑन-साइट रासायनिक विश्लेषण करेगा और चंद्रयान-2 ऑर्बिटर के माध्यम से पृथ्वी पर आंकड़े भेजेगा।

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