- सिस्टम की वकालत की जा रही है। अगर इसे लागू किया भी जाता है, तो निजी स्कूल इसके दावेदार होंगे। इससे तो अच्छा है कि उस राशि को सरकारी स्कूलों का स्तर बढ़ाने में लगाया जाए। सरकारी स्कूलों को ‘करो या मरो’ का विकल्प नहीं दिया जा सकता। उनको बेहतर प्रदर्शन के लिए हर हाल में प्रोत्साहित करना होगा।
- आई आई टी जैसे उच्च शिक्षा संस्थाओं में आरक्षण के कारण एक निर्धन सवर्ण परिवार का बच्चा प्रवेश नहीं पा सकता, क्योंकि सरकारी स्कूलों की शिक्षा स्तरीय नहीं है, और महंगे कोचिंग संस्थानों के लिए उसके पास धन नहीं है। वह दो तरफा मार झेलता है।
अगर सरकारी स्कूलों का यही हाल रहा, तो इसका खामियाजा आर्थिक रूप से विपन्न बच्चों को उठाना होगा। उच्च शिक्षा के अच्छे संस्थान हमेशा उनकी पहुँच से बाहर ही रहेंगे।
निजी स्कूलों और विश्वविद्यालयों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। परन्तु ये संस्थान उनके लिए हैं, जो फीस दे सकते हैं। उम्मीद की जा सकती है कि शिक्षण संस्थानों को सामाजिक और आर्थिक रूप से न्यायसंगत और बराबरी पर रखा जाए।