असहयोग आंदोलन सन 1921 को वापस लेने के बाद कांग्रेस दो भागों में बांट गई जब असहयोग आंदोलन शुरू हुआ था तब विधान परिषदों का बहिष्कार करने का निर्णय लिया गया था|
एक दल जिसका नेतृत्व चितरंजन दास तथा मोतीलाल नेहरू कर रहे थे, चाहता था कि कांग्रेस को चुनाव में भाग लेना चाहिए |
दूसरा दल जिसका नेतृत्व वल्लभभाई पटेल डॉक्टर अंसारी के और राजेंद्र प्रसाद कर रहे थे जो इस प्रस्ताव के विरोधी थे वे चाहते थे कि कांग्रेस रचनात्मक कार्य में लगी रहे सन् 1922 ईस्वी में कांग्रेस का अधिवेशन गया में हुआ इसके अध्यक्ष चितरंजन दास थे इस अधिवेशन ने परिषदों में ना जाने के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया|
इस प्रस्ताव के समर्थकों ने 1923 ईस्वी में अबुल कलाम आजाद की अध्यक्षता में दिल्ली में आयोजित विशेष अधिवेशन में कांग्रेस ने स्वराज्य को चुनाव लड़ने की अनुमति दे दी स्वराज्य ने केंद्रीय और प्रांतीय परिषदों में काफी संख्या में सीटें प्राप्त की| (101 सीटों में 42 सीटों पर विजय प्राप्त की)|
ब्रिटिश शासकों द्वारा प्रस्तुत उनकी नीतियों और प्रस्ताव के लिए परिषदों की सम्मति प्राप्त करना लगभग असंभव बना दिया गया सरकार ने 1928 ईस्वी में विधान परिषद में एक ऐसा भी उपाय पेश किया जिसके तहत वह भारत की आजादी के संघर्ष को समर्थन देने वाले किसी भी गैर भारती को देश से निकाल सकती थी परंतु यह बिल पास नहीं हुआ सरकार ने पुनः उस बिल को पेश करने की कोशिश की तो परिषद के अध्यक्ष विट्ठल भाई पटेल ने बिल को पेश करने की अनुमति नहीं दी परिषदों में होने वाले चर्चा में भारतीय सदस्य अक्सर सरकार को पछाड़ देते थे और उनकी निंदा करते थे इस तरह से फरवरी 1924 में गांधी जी जेल से छूटे और रचनात्मक कार्यक्रम जिसे कांग्रेस के दोनों गुटों ने स्वीकार किया और कांग्रेस के प्रमुख गतिविधि बन गई|
-रचनात्मक कार्यक्रम के सबसे प्रमुख घटक थे- (खादी का प्रचार हिंदू मुस्लिम एकता को मजबूत बनाना और अस्पृश्यता को दूर करना)|
किसी भी कांग्रेस कमेटी के सदस्य के लिए यह अनिवार्य हो गया कि वह हाथों से खाते और बुने गए खादी का ही प्रयोग करें तथा प्रतिमा 2000 गज सूत काते |
अखिल भारतीय खाद्य संगठन की स्थापना हुई देशभर में खादी भंडार खोले गए गांधीजी खादी को गरीबों के दरिद्रता से मुक्त कर देने वाला देश और आर्थिक उत्थान के साधन मानते थे इसने आजादी के संघर्ष के संदेश को देश के हर हिस्से में विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंचाने में योगदान दिया चरखा आजादी के आंदोलन का प्रतीक बन गया |इस तरह से स्वराज पार्टी की स्थापना हुई|