बैड बैंक (Bad Bank) की अवधारणा कितनी सार्थक? (Part 1)

सरकार ने बैड बैंक स्थापित करने का विचार किया है। आखिर क्या है यह बैड बैंक? इसकी क्या आवश्यकता है? बैड बैंक के बिना क्या हमारे बैंकों के कामकाज में गतिरोध आ रहा है? और अगर आ रहा है, तो बैड बैंक उन्हें दूर करने में कैसे और कितने सक्षम हो पाएंगे? ऐसे कई सवाल हैं, जो बैड बैंक की कार्यप्रणाली को समझे और परखे बिना मस्तिष्क में घूमने स्वाभाविक हैं?

हमारे नीति-निर्धारकों को बैड बैंकों की स्थापना के बारे में एक बात स्पष्ट कर देनी चाहिए कि ये बैंक भारतीय बैंकिंग सैक्टर की क्षमता को पुनः प्राप्त करने का माध्यम बनेंगे। यही इन बैंकों का उद्देश्य होगा। भारतीय बैंकिंग जगत में ऐसे क्या कारक हैं, जिनसे उनकी क्षमता का हृास हो रहा है?

  • भारतीय बैंकों में ऐसी बहुत सी स्ट्रैस्ड संपत्तियां ( Stressed  assets) हैं, जो अलग-अलग बैंकों में फैली हुई हैं या यूं कहें कि अलग-अलग बैंक इन स्ट्रैस्ड संपत्तियों से जूझ रहे हैं।
  • सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रबंधक या वरिष्ठ अधिकारियों का समय इन स्ट्रैस्ड संपत्तियों के प्रबंधन में बर्बाद हो रहा है। इस कारण वे बैंकों के सामान्य कामकाज, जैसे ऋण अदायगी या ऋण प्राप्तकर्ता की पर्याप्त जांच आदि में अपना समय नहीं दे पाते। यही कारण है कि सार्वजनिक बैंक ऋण देने में बहुत पीछे चल रहे हैं।
  • स्ट्रैस्ड संपत्तियों के कारण सार्वजनिक बैंक बहुत से कानूनी एवं संस्थानीय नियमों में फंसे रहते हैं। यदि किसी स्ट्रेस्ड संपत्ति के मामले में केन्द्रीय सतर्कता आयोग कोई निर्णय लेना चाहे, तो बैंकों के सामने नियम आड़े आते हैं और वे उनमें उलझकर सीबीसी या सीबीआई को ग्राहक के विरोध में कोई कदम उठाने के लिए लिखित दावा करने की स्थिति में नहीं होते।
  • स्ट्रैस्ड संपत्ति को जब्त किए बिना सार्वजनिक बैंकों के पास इतनी पूँजी नहीं होती कि वे नए ऋण दे सकें।
  • स्ट्रैस्ड संपत्ति का मामला ऐसा है, जिसमें सार्वजनिक बैंक चक्रवात की तरह गोल-गोल घूम रहे हैं, और उससे निकल नहीं पा रहे हैं। बैड बैंक की स्थापना के पीछे इन बैंकों को इस चक्रवात से निकालने की ही अवधारणा निहित है।
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