बैड बैंक (Bad Bank) की अवधारणा कितनी सार्थक? (Part 2)

बैड बैक कैसा हो–
  • सर्वप्रथम बैड बैंक की स्थापना निजी इक्विटी फंड की तरह करनी चाहिए, जिसमें सरकार की 50% से भी कम इक्विटी हो।
  • इन बैंकों में अलग-अलग बैंकों और अन्य क्षेत्रों के ऐसे विशेषज्ञों को रखा जाएगा, जो अलग-अलग बैंकों की बैड संपत्ति ( Bad assets)का प्रबंधन और पुनर्गठन कर सकें। स्टैªस्ड या बैड संपत्ति का अर्थ उन संपत्तियों से है, जिन्हें बैंकों ने ऋण के रूप में अपने ग्राहकों को दिया था और अब उन्हें वापस प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं। इस संदर्भ में विजय माल्या का उदाहरण लिया जा सकता है।
  • बैड बैंक को केन्द्रीय सतर्कता आयोग या सीबीआई जैसी बाहरी निगरानी के बजाय किसी आंतरिक सतर्कता टीम के अंतर्गत रखा जाए।
  • अगर बैड बैंक में सरकारी इक्विटी स्टेक 50% से भी कम होता है, तो उसे अपने कर्मचारियों को पर्याप्त धनराशि देने में कोई संकोच या अवरोध नहीं होगा। गौर करने की बात है कि एक तरह से डूबी संपत्ति को पुनर्जीवित करना या प्राप्त करना कोई आसान काम नहीं है। बैड बैंक के कर्मचारी अपनी क्षमता के अनुसार जितनी संपत्ति प्राप्त करने में सफल होते हैं, उन्हें उनके कार्य के अनुसार पर्याप्त पुरस्कार भी मिलना चाहिए।
  • बैड बैंक के प्रस्तावित ढांचे के अनुरूप अगर सब कुछ चलता रहा, तो निजी निवेशक भी इन बैंकों की इक्विटी में निवेश करना चाहेंगे। ये निजी निवेशक इन बैंकों की स्ट्रैस्ड संपत्तियों के लिए स्वतंत्र बोली लगा सकेंगे। इन निवेशकों में से कुछ इक्विटी स्टेक के अनुरूप बोर्ड में शामिल हो सकेंगे। बोर्ड के ये विशेषज्ञ बैंक के प्रबंधन पर अधिक पैनी नजर रख सकेंगे।
  • सरकार को ध्यान रखना होगा कि बैंक की स्ट्रैस्ड संपत्ति के धारक को बैड बैंक में निवेश की अनुमति न दी जाए।
  • बैड बैंक की मदद से बाकी के बैंक अपना काम सामान्य रूप से कर सकेंगे और उन्नति कर सकेंगे।
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