भारत ब्रिटिश उत्पादकों के लिए बाजार और बेटे शब्दों के लिए कच्चे माल का स्रोत बन गया ब्रिटिश सरकार द्वारा अपनाई गई नीति के कारण भारत में उद्योगों का विकास बहुत धीमी गति से हुआ आधुनिक व्यापार और उद्योग एकीकरण की प्रबल सकती हैं जो देश के विभिन्न भागों को एक दूसरे के पास लाती हैं उद्योगों में काम करने वाले लोग देश के विभिन्न क्षेत्रों विभिन्न जातियों और संप्रदायों के होते हैं अतः ऐसी परिस्थितियां पैदा होते हैं कि उनमें जाति संप्रदाय के और क्षेत्रीय तत्व मिटने लग जाता है |
कारखानों में काम करने वाले लोगों में भाईचारा की भावना पैदा होती इससे वे एकजुट होते हैं एवं विशेष मांगों के लिए आंदोलन शुरू करते हैं नगर राजनीतिक आंदोलन के जन्म स्थल बन जाते हैं इन सभी कारणों से उद्योगों का विकास लोगों को एक राष्ट्र के रूप में आबद्ध करने की महान भूमिका निभाई 19वीं सदी के उत्तरार्ध में भारत में प्रारंभ हुए आधुनिक उद्योगों के विकास में राष्ट्रीय चेतना को भरने में मदद की उद्योगों का विकास होने लगा तो समाज में दो महत्वपूर्ण वर्गों का उदय हुआ→
1- पूंजीपति वर्ग 2- औद्योगिक मजदूरों का वर्ग |
इन दोनों वर्गों के अधिक विकास के लिए देश का औद्योगीकरण होना आवश्यक था क्योंकि ब्रिटिश शासन भारत के औद्योगिक विकास में बाधक बना हुआ था इसलिए वह इन दोनों वर्गों का भी विरोधी था इनमें से प्रत्येक वर्ग के के अपने एक से सर्वोदय से खेत भी थे उदाहरण के लिए संपूर्ण देश के सूती कपड़ा कारखानों के मालिक अंग्रेजों की आर्थिक नीतियों के कारण समान रूप से प्रभावित हुए थे तथा उनकी समस्याएं व उद्देश्य समान थे नए शिक्षक मध्य वर्ग के भी एक से अधिक हित थे और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध उनकी एक सी शिकायतें भी थी इस तरह से भारत में आधुनिक उद्योगों की स्थापना की प्रणाली पूर्ण रूप से सफल होती है|