- होमर के इस विचार को नव-उपनिवेशवाद की भावना से प्रेरित माना जा रहा है। ऐसा कहा जा रहा है कि गरीब देशों को फास्टियन बार्गेन के लिए उकसाया जा रहा है। अर्थात् आर्थिक विकास का आकर्षण देकर उनसे उनकी संप्रभुता का सौदा किया जा रहा है। होमर का कहना है कि चार्टर सिटी में रहने के लिए लोगों को विकल्प दिया जा रहा है। उन्हें बाध्य नहीं किया जा रहा है। यह उपनिवेशवाद से भिन्न है।
- चार्टर सिटी के सिद्धाँत की आलोचना इस बात पर भी की जा रही है कि यह प्रजातंत्र और नागरिकता के आधारभूत सिद्धाँतों के विरूद्ध है। यहाँ लोगों को शहर के प्रशासक पर अपना मत देने का कोई अधिकार नहीं होगा।
- होमर का कहना है कि चार्टर सिटी की अवधारणा को उपनिवेशवादी मानसिकता से प्रेरित इसलिए भी नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि इसके प्रशासन में विदेशी सरकार का शामिल होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया होगी। इसके अलावा एक अवसर पर होमर ने अपने सिद्धाँत के पक्ष में तर्क देते हुए हांगकांग का उदाहरण दिया, और बताया कि हांगकांग में गरीबी उन्मूलन के लिए चलाए गए सभी आयोजन, उसका वैसा उत्थान नहीं कर सके, जैसा कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने कर दिखाया। इसी से प्रेरित होकर चीन के कम्यूनिस्ट नेता देन जियाओ पिंग ने 1980 में चीन में विशिष्ट आर्थिक गलियारों का निर्माण किया था।
भारत में चार्टर सिटी की संभावना –
2008 में मेडागास्कर और 2012 में हॉन्डूरस जैसे देशों में इस योजना की असफलता के बाद भारत जैसे देश के लिए यह विचारधारा बहुत उपयुक्त नहीं जान पड़ती है। भारत की वर्तमान सरकार पर ब्रिटिश इंडिया के प्रेसीडेंसी टाऊन की तर्ज पर, चार्टर सिटी बनाने के लिए कुछ दबाव डाले गए थे। चीन और भारत जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं को इस प्रकार के नए शहरों के निर्माण और अपना प्रशासन रखने के भी प्रस्ताव दिए गए।
भारत के सामने दक्षिण कोरिया में बनाए गए इस प्रकार के आर्थिक क्षेत्र की विफलता का उदाहरण है। दूसरे, भारत में पुणे के पास एक निजी कंपनी की सहायता से निर्मित लवासा नामक क्षेत्र, वर्षों से पर्यावरणीय विवादों में ऊलझा हुआ है। इसी प्रकार गुजरात का ढोलेरा प्रोजेक्ट भी अभी तक शुरू नहीं हो पाया है। दिल्ली-मुंबई के बीच बनने वाला औद्योगिक गलियारा धीमी गति से आगे बढ़ रहा है। 100 स्मार्ट शहरों के निर्माण की योजना को, चयनित शहरों के एक छोटे हिस्से को स्मार्ट बनाने तक ही सीमित कर दिया गया है।
‘चार्टर सिटी‘ निर्मित करने के लिए शून्य में से सब कुछ विकसित करने का विचार है। इस प्रकार के टेक्नोक्रेटिक शहरों को राजनीति की गंदगी से बहुत दूर रखने की आवश्यकता होगी। इसके निर्माण क्षेत्र को सामाजिक और राजनीतिक दावों से मुक्त कर पाना ही, भारत जैसे देश के लिए एक चुनौती है।