उन्नीसवीं सदी के अंत में यह व्याख्या की गई थी कि गर्मी के महीनों में स्थलों समुद्र का विभक्ति तापमान मानसून पवनों के उपमहाद्वीप की ओर चलने के लिए मंच तैयार करता है अप्रैल और मई के महीनों में जब सूर्य कर्क रेखा पर लंबवत चमकता है तो हिंद महासागर के उत्तर में स्थित विशाल भूखंड अत्यधिक गर्म हो जाता है इसके फलस्वरूप उपमहाद्वीप के उत्तर पश्चिमी भाग पर एकदम न्यूनतम क्षेत्र विकसित हो जाता है क्योंकि हिंद महासागर धीरे धीरे गर्म होता है निम्न दाब निम्न वायुदाब केंद्र विषुवत रेखा के उस पार से दक्षिण पूर्वी सनमार्ग ई पवनों को आकर्षित कर लेता है इन दशाओं में अंतर उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र उत्तर की ओर स्थानांतरित हो जाता है इस प्रकार दक्षिण पश्चिमी मानसूनी पवनों को दक्षिणी पूर्वी सनमार्ग ई प्रों के विस्तार के रूप में देखा जा सकता है जो भूमध्य रेखा को पार करके भारतीय उपमहाद्वीप की ओर लिखे पित्त हो जाती है यह पवन ए भूमध्य रेखा को 40 डिग्री पूर्वी तथा 7 डिग्री पूर्वी देशांतर रेखाओं के बीच पार करती है उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र की स्थिति में परिवर्तन का संबंध हिमालय के दक्षिण में उत्तरी मैदान के ऊपर से पश्चिमी द्वारा अपनी स्थिति के प्रत्यावर्तन से भी है क्योंकि पश्चिमी जेट प्रवाह के इस क्षेत्र से ही दक्षिणी भाग में 15 उत्तर अक्षांश पर पूर्ण विकसित हो जाता है इसी पूर्वी जेट प्रवाह को भारत में मानसून के सपोर्ट के लिए जिम्मेदार माना जाता है मानसून का भारत में प्रवेश दक्षिणी पश्चिमी मानसून किरण पथ पर 1 जून को पहुंचता है और शीघ्र ही 10 और 13 जून के बीच आज बने मुंबई और कोलकाता तक पहुंच जाती है मध्य जुलाई तक संपूर्ण उपमहाद्वीप दक्षिण पश्चिम मानसून के प्रभावाधीन हो जाता है.