18 वीं सदी में भारत के राज्य और समाज (भाग 2)

      राज्यों के शासकों ने शांति व्यवस्था बहाल की तथा व्यवहारिक, आर्थिक और प्रशासनिक ढांचा खड़ा किया। निचले स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों, छोटे-छोटे सरदारों तथा जमींदारों की ताकते कम की और इस काम में इन सबको अलग अलग मात्रा में सफलता मिली। किसानों के अधिशेष उत्पादन पर नियंत्रण के लिए यह लोग ऊपर के अधिकारियों से झगड़ते रहते थे और कभी-कभी सत्ता और संगठन के स्थानीय केंद्र कायम करने में यह लोग सफल भी हो जाते थे। उन्होंने इन स्थानीय जमींदारों तथा सरदारों से भी समझौता किया तथा उनको अपने साथ लिया जो शांति और व्यवस्था चाहते थे। आमतौर पर कहा जाए तो अधिकांश राज्यों में राजनीतिक अधिकारों का विकेंद्रीकरण हो गया तथा सरदारों, जागीरदारओं और जमींदारों को इसके कारण राजनीतिक और आर्थिक शक्ति की दृष्टि से लाभ मिला। इन राज्यों की राजनीति लगातार गैर-संप्रदाय या धर्मनिरपेक्ष बनी रहे क्योंकि राज्यों के शासकों की आर्थिक तथा राजनीतिक प्रेरक सक्ति समान थी।

       सार्वजनिक स्थानों की नियुक्तियों सेना में भारतीय नागरिक सेवाओं में यह शासक धार्मिक आधार पर भेदभाव नहीं बरतते थे और जब लोग किसी सत्ता अथवा शासन के विरुद्ध विद्रोह करते थे तो इस बात पर विचार नहीं करते थे कि उनके साथ साथ का धर्म क्या है। इसलिए इस बात पर विश्वास करने के लिए कोई आधार नहीं मिलता है कि मुगल साम्राज्य के पतन और विघटन के बाद भारत के विभिन्न भागों में कानून और व्यवस्था की समस्या उठ खड़ी हुई और चारों और अराजकता फैल गई। वास्तविकता तो यह है कि 18 वीं शताब्दी से प्रशासन तथा अर्थव्यवस्था में जो भी अव्यवस्था विद्यमान थी, वह भारतीय राज्यों के आंतरिक मामलों में ब्रिटिश हस्तक्षेप और ब्रिटेन द्वारा चलाए गए विजय अभियानों का प्रणाम थी।

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