कृषि नीति को बदलने के लिए किए गए आंदोलन कृषक आंदोलन कहलाते हैं। चौथे दशक में भारत के किसानों और मजदूरों में राष्ट्रव्यापी जागरण देखने को मिला। 1920-22 तथा 1930-34 के दो राष्ट्रवादी आंदोलनों ने किसानों और मजदूरों का बड़े पैमाने पर राजनीतिकरण किया था। 1929 के बाद भारत तथा शेष विश्व पर आर्थिक मंदी की मार पड़ी उसने भारतीय किसान मजदूरों की दशा बिगाड़ दी थी। 1932 के अंत तक खेतिहर पैदावार की कीमतें 50% से अधिक गिर चुकी थी। अब पूरे देश में किसान भूमि सुधारों मालगुजारी और लगान में कमी तथा कर्ज से राहत की मांग करने लगे थे। कारखानों और बागानों के मजदूर अब काम की बेहतर परिस्थितियों तथा ट्रेड यूनियन अधिकार दिए जाने की बढ़-चढ़कर मांग कर रहे थे।
कृषक आंदोलन का इतिहास बहुत पुराना है और विश्व के सभी भागों में अलग-अलग समय पर किसानों ने कृषि नीति में परिवर्तन करने के लिए आंदोलन किए हैं ताकि उनकी दशा सुधर सके। मौजूदा दौर में भारत में कृषक आंदोलन तेज गति से बढ़ रहा है इसका मुख्य कारण कृषि की आर्थिक हालत दिन-ब-दिन कमजोर हो रही और वह कर्ज के जाल में फंसते जा रहे हैं। मौजूदा दौर में कृषि में लागत बढ़ रही है और आमदनी घट रही है, जिस कारण से किसानों में आत्महत्या की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। दूसरी तरफ लोग कृषि नीति बदलवाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वर्ष 2017 में देश में छोटे-बड़े सैकड़ों आंदोलन हुए। देश में सरकार को कृषि के संबंध में बोलने पर मजबूर किया गया है जिसमें महाराष्ट्र का जून 17 में गांव बंद हो चाहे, नासिक से मुंबई तक का मार्च हो, राजस्थान में पानी व बिजली के सवालों पर आंदोलन हो, हरियाणा में 2015 में फसल के खराब होने पर मुआवजे की मांग का आंदोलन हो या फिर तमिलनाडु के किसानों का महीनों तक संसद मार्ग पर धरना मुख्यत रहे हैं।
नागरिक अवज्ञा आंदोलन तथा वामपंथी पार्टियों और गुटों ने राजनीतिक कार्यकर्ताओं की एक ऐसी नई पीढ़ी पैदा की जो किसानों और मजदूरों के संगठन के लिए समर्पित थी। परिणाम स्वरूप शहरों में ट्रेड यूनियनों का तथा पूरे देश में खासकर संयुक्त प्रांत, बिहार, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल और पंजाब में किसान सभाओं का तेजी से प्रसार हुआ। 1936 में स्वामी सहजानंद सरस्वती की अध्यक्षता में पहला अखिल भारतीय किसान संगठन, अखिल भारतीय किसान सभा के नाम से बना।