नए युग का औरंगज़ेब (part 2)

हम ऐसे सौभाग्शाली लोगों में से हैं, जिन्हें स्कूली पुस्तकों में अकबर की सकारात्मक छवि से मिलवाया गया। यही कारण है कि हमारे मन-मस्तिष्क में ‘अकबर-द ग्रेट’ की छवि वैसी ही अंकित है, जैसे अशोक महान् की। लेकिन शायद आगे आने वाली पीढ़ियों को यह सौभाग्य न मिले। अकबर को एक ऐसे शासक के रूप में दिखाए जाने की तैयारी हो रही है, जिसने हल्दी घाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप से शिकस्त खाई। अब महाराणा प्रताप को 1857 की क्रांति का प्रेरणा स्रोत बताया जा रहा है। इतना ही नहीं, अकबर की सारी उपलब्धियों को कुटिल षड़यंत्रों के हिस्से के रूप में प्रस्तुत किए जाने की भी तैयारी हो रही है।

2017 के प्रारंभ में अजमेर स्थित अकबर के किले के द्वार से अकबर का नाम मिटाकर उसे मात्र अजमेर का किला कहलाए जाने का प्रबंध किया गया। कुछ ही समय में ‘अजमेर का किला’ लिखा हुआ एक नया बोर्ड भी लटका दिया गया। ऐसा लगने लगा कि बीते मानूसन के बाद एकदम से यह कहीं से ऊग आया हो। अगर अबुल फज़ल पर विश्वास किया जाए, तो यह किला 1570 में बनवाया गया था। जहाँगीर के काल में भी यह किला बड़ा महत्वपूर्ण रहा। शहजादे सलीम के रूप में जहाँगीर का यहाँ लंबा प्रवास रहा।

इस प्रकरण से ही संतुष्ट न होने वाली हिन्दू ब्रिगेड ने हल्दीघाटी के युद्ध के परिणामों को पलटने के लिए कुछ अविश्वसनीय इतिहासकारों का सहयोग पा लिया। यहाँ राणा प्रताप की बहादुरी के किस्से पढ़ते-सुनते विद्यार्थियों की पीढ़ियां निकल गईं। यह भी पढ़ा गया कि उसे मुगलों से हार का सामना करना पड़ा था। यह भी कि हल्दीघाटी का युद्ध स्वयं अकबर ने नहीं लड़ा था, बल्कि इसका भार उसने मानसिंह पर छोड़ दिया था। अब इतने समय बाद राजस्थान सरकार ने इतिहास की पुस्तकों में हल्दी घाटी के विजेता के रूप में महाराणा प्रताप का नाम लिखना शुरू कर दिया है। यहाँ केवल ऐतिहासिक साक्ष्य की बात नहीं आती, बल्कि वह दृष्टिकोण है, जो मायने रखता है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने तो अकबर को नए जमाने का औरंगजेब ही घोषित कर दिया है।

अकबर को बदनाम करने की कोशिशें कोई नई नहीं हैं। पिछले चार वर्षों से, इस देश के लिए दिए गए अकबर के योगदानों को तुच्छ करके आंका जा रहा है। 2016 में अकबर रोड़ का नाम बदलकर महाराणा प्रताप रोड़ किए जाने का प्रस्ताव रखा गया था। प्रकट रूप में तो यही कहा गया कि राजपूतों को ऐसा सम्मान मिलना चाहिए। परन्तु इसके साथ जो प्रत्यक्ष रूप में नहीं कहा गया, क्या वह यह था कि मुगलों के महान् शासकों के लिए दिल्ली में कोई जगह नहीं है; उसी दिल्ली में, जो उनके शासनकाल का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा। ऐसा लगने लगा है कि वर्तमान सरकार, राष्ट्र निर्माण में अकबर द्वारा दिए गए योगदान को उखाड़ फेंकना चाहती है, और उसे नई सदी के औरंगजेब की छवि से धूमिल करना चाहती है।

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