भारत का विकास मॉडल (part 1 )

भारतीय अर्थव्यवस्था, विश्व की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। इसका विकास- मॉडल अन्य पूर्वी या पश्चिमी एशियाई देशों की अपेक्षा भिन्न है। उनका विकास-मॉडल फॉर्म से फैक्टरी का है, जो तेज गति से औद्योगीकरण, शहरीकरण एवं प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर आधारित है। भारत के लिए यह उपयुक्त नहीं लगता। विश्व में पहले ही रोबोटिक्स के चलते ऑटोमेशन और तेजी से बढ़ते आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस के कारण विनिर्माण क्षमता में बहुत असंतुलन आ चुका है। इन स्थितियों में ज्यादा लोगों को रोजगार दे पाने की कोई उम्मीद दिखाई नहीं दे रही है।

भारत में, शहरों की ओर बढ़ते प्रवास को संभालने की सीमित क्षमता है। अस्त-व्यस्त रूप में बढ़ते शहरीकरण ने हमारे परंपरागत सामाजिक ढांचे को ऊथल-पुथल कर दिया है। हमारे प्राकृतिक संसाधन सीमित और महंगे हैं।अपनी परिस्थितियों के मद्देनजर हम फार्म-फैक्टरी मॉडल की जगह फार्म टू फ्रंटियर मॉडल पर चल रहे हैं। यह विकास का ऐसा मॉडल है, जो वैश्विक उत्पादकता मंच पर नवाचार आधारित सेवाओं पर निर्भर करता है। इसके अंतर्गत आने वाले उद्योग, ऐसी तकनीक का प्रयोग करते हैं, जिससे उत्पादकता बढ़ाई जा सके। परन्तु ऐसा संभव होने के लिए कौशल का निरंतर विकास करना होता है। इसके परिणामस्वरूप आय में बढ़ोत्तरी होती है।

यह मॉडल विनिर्माण पर आधारित न होकर सेवा उद्योग पर आधारित है। भारत के सकल घरेलू उत्पाद में सेवाओं का 57 प्रतिशत और विनिर्माण का 15 प्रतिशत योगदान है। चीन में यही क्रमशः 52 प्रतिशत और 29 प्रतिशत है। इस मॉडल पर चलते हुए सरकार, बड़े शहरों की जगह 3, 4 और 5 स्तर वाले शहरों पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हुए उन्हें विश्व स्तरीय सुविधाओं से लैस कर रही है। चीन की तुलना में भारत, प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग बड़ी मितव्ययिता से कर रहा है।

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