भारत का विकास मॉडल (part 2)

भारत के इस मॉडल को चुनने का कारण उसकी प्राथमिकता का अंतर है। हमने निर्यात आधारित आपूर्तिकर्ताओं को बढ़ावा देने वाली व्यवसायी मानसिकता को न अपनाकर, अपनी जनता को प्राथमिकता देते हुए घरेलू उपभोग को सर्वोपरि रखा है। इसका परिणाम यह हुआ है कि जनता के सामर्थ्य के अनुसार, कम कीमत वाली सेवाएं दी जा रही हैं। ‘सैशे’ जैसी छोटी पैकिंग का प्रचलन बढ़ा है। इससे हमारी अर्थव्यवस्था, युवाओं को उच्च प्रतिस्पर्धा वाले उद्योगों में तकनीक से लैस पारिस्थितिकीय तंत्र विकसित करने को प्रेरित कर रही है।

इस प्रकार के उद्योग अप्रत्यक्ष रोजगार के निर्माण में बहुत आगे बढ़ते जा रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग में दिया गया एक रोजगार, अप्रत्यक्ष रूप से तीन और लोगों को काम देता है। दूसरा उदाहरण, टैक्सी शेयरिंग कंपनी का लिया जा सकता है। इस उद्योग में कोई भी बेरोजगार युवा, प्रशिक्षण लेकर ड्रायवर बन सकता है। तीसरा, उड्डयन उद्योग है। इसमें युवाओं को रखरखाव, केबिन क्रू और सर्विस एजेंट के रूप में रोजगार दिया जा रहा है।

हमारी सरकार इस प्रकार के फ्रंटियर उद्योगों को बहुत बढ़ावा दे रही है। इनके लिए नियम और मानक भी तेजी से तैयार किए जा रहे हैं। कुछ ही समय में सरकार द्वारा ड्रोन के व्यावसायिक उपयोग पर नियमन जारी किए जाने की योजना इस दिशा में किए जा रहे सरकारी प्रयासों का एक उदाहरण प्रस्तुत करता है। साथ ही इन उद्योगों के अस्तित्व के लिए स्टेनफोर्ड टेक समूह और एमआइटी लाइफ साइंस की तरह नवोन्मेष समूह तैयार किए जाने की जरूरत है। इस विकास मॉडल के साथ अगले 20 वर्षों में हमारा सकल घरेलू उत्पाद 10 खरब डॉलर तक पहुँच सकता है। इस प्रकार हमारा देश मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्था के स्तर पर पहुँच सकेगा।

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