पुलिस की भूमिका बदली जाए (part 1)

1960 में भारत और अमेरिका दोनों ही देश कानून-व्यवस्था की बिगड़ी स्थिति से परेशान थे, और इससे निपटने का प्रयत्न कर रहे थे। दोनों ही देशों ने अलग-अलग रास्ते अपनाए, और अलग-अलग परिणाम भी पाए।

भारत में पुलिस-व्यवस्था की शुरूआत अंग्रेजों ने की थी। जाहिर सी बात है कि अपने दमनकारी शासन की रक्षा के लिए उन्हें सैन्यवादी और कड़क पुलिस चाहिए थी, और उन्होंने वैसा ही किया।

पुलिस व्यवस्था के जनक कहे जाने वाले रॉबर्ट पील ने 1829 में लंदन मेट्रोपोलिटन पुलिस की स्थापना की। पुलिस की शुरूआत के साथ ही उनका विचार था कि यह ‘नागरिकों को यूनिफार्म’ पहना देने जैसी भूमिका निभाए। उन्होंने नवनिर्मित पुलिस-बल से लोगों के बीच घुल-मिलकर काम करने और अपराध से सुरक्षा को प्राथमिकता देने की अपील की। उनके इस सिद्धान्त ने लोगों को भी अपराध रोकने में भागीदार बना दिया। यह विचार बहत ही सफल रहा।

20वीं शताब्दी में ऑटोमोबाइल और दूरसंचार के विकास के साथ ही पुलिस की भूमिका अपराध से लड़ने वाले व्यावसायिकों की हो गई और यह पूरी व्यवस्था गश्त, सेवा में तत्पर रहने और अपराध की जाँच-पड़ताल में प्रतिक्रियाशीलता पर केन्द्रित हो गई। इन सबके बीच नागरिकों की भूमिका कम होती गई। वे अपराध को रोकने वाले के स्थान पर सहायता मांगने वाले बन गए। गश्त के लिए मोटर वाहन के बढ़े प्रयोग ने पुलिस को लोगों से दूर कर दिया।अब पुलिस किसी आपराधिक स्थल पर ही लोगों से रूबरू होने लगी। आम जनता का उसके प्रति और उसका आम जनता के प्रति भाव बदल गया।

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