गैर सनातनी संप्रदायों की पृष्ठभूमि

सातवीं से पांचवी  शताब्दी ई. पू. के बीच भारत का बौद्धिक जीवन उथल-पुथल की स्थिति में था। यह काल संपूर्ण विश्व के बौद्धिक तथा आध्यात्मिक विकास में एक निर्णायक काल था। इस काल में यूनान में प्रारंभिक दार्शनिकों, महान हिब्रू पैगंबरों, चीन में कन्फ्यूशियस तथा फारस में जरथुष्ट्र का विकास हुआ। इस काल में भारत में एक और उपनिषदों का ज्ञान देने वाले ऋषि थे जिनके प्रेरणा स्रोत वेद थे, तो दूसरी ओर कुछ ऐसे कम परंपरावादी उपदेशकों का अवीभाॅव हुआ जिन्होंने वेदों को पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया। इस काल में विशेष सिद्धांत वाली अनेक गैर सनातनी प्रणालियों का विकास हुआ जिनके मोक्ष प्राप्त करने के अलग-अलग नियम थे। इस काल में बौद्ध तथा जैन धर्मों का उदय हुआ।

इस महान गैर सनातनी विकास के सामाजिक पृष्ठभूमि तथा जैन तथा बौद्ध परंपराओं से ठीक तरह से नहीं जाने जा सकती है। यह परंपराएं बाद के चितंको ने विकसित की है, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि इसका ठोस विकास बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश में हुआ इस क्षेत्र में आर्य सभ्यता तथा धर्म का आगमन तुलनात्मक रूप से हाल ही में हुआ था। लोग आर्य जाति प्रथा से कम प्रभावित थे। ब्राह्मणों का प्रभाव पूरी तरह से स्थापित नहीं हुआ था। आर्य देवताओं की पूजा की अपेक्षा चैत्यों तथा विहारों में यक्षों तथा नागो जैसे स्थानीय देवताओं की पूजा पर ज्यादा ध्यान दिया जाता था ।शहरों की उत्पत्ति हो चुकी थी जिनमें समृद्धि व्यवसायियों का वर्ग रहता था जबकि किसानों का जीवन स्तर भी तुलनात्मक रूप से अच्छा था।

प्राचीन कबायली ढांचे का पतन हो रहा था तथा कई गणराज्य सहित राजतंत्रो का उदय हो चुका था। गणराज्यों में कबायली ढांचे के अधिक तत्व विद्यमान थे। अधिकतर गणराज्य राजनैतिक रूप से कम महत्वपूर्ण थे तथा सर्वाधिक विशाल राजतंत्र कोसल पर आश्रित थे;  इस तरह का एक गणराज्य हिमालय की पहाड़ियों में शाक्य गणराज्य था। इन गणराज्यों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण वज्जियन संघ था जिसका सबसे बड़ा घटक लिच्छवी कबीला था। इस संघ का नियंत्रण उत्तरी बिहार पर था तथा इनका शासन एक प्रमुख के हाथ में था। इस प्रमुख की राजनैतिक शक्ति का स्रोत कबीले के पुरुषों की एक बड़ी सभा थी । यह अन्य छोटे प्रमुखों की सहायता से शासन करता था। दक्षिण बिहार में मगध का राजतंत्र था। मगध ने शीघ्र ही विज्ज तथा कोसल पर अधिकार कर लिया तथा इसका विस्तार तब तक होता रहा जब तक सुदूर दक्षिण के अलावा संपूर्ण भारतीय उपमहादीप की राजधानी पाटलिपुत्र न हो गई।

उपनिषदों तथा अन्य अपारंपारिक शाखाओं के कर्ममार्ग की जगह ज्ञानमार्ग की शिक्षा दी। उनका मुख्य लक्ष्य जन्म मरण के चक्र से मुक्ति तथा दूसरों को इस लक्ष्य तक पहुंचाना था। उनमें अधिकतर का मानना था कि मोक्ष प्राप्ति लंबे शारीरिक तथा मानसिक अनुशासन से ही संभव थी। फिर भी अलग अलग मतों में गहरा मतभेद थाा।

बौद्ध ग्रंथों के अनेक अवतरण हमें छ: गैरपारंपरिक आचार्यों की जानकारी देते हैं जिनमें प्रत्येक महत्वपूर्ण पंथ का अगुआ था एवं जिनके पास अपने समर्थक थे।  दीर्घनिकाय के एक अनुच्छेद में इन धाराओं के मूल विचारों का संक्षिप्त विवरण है।

सर्वप्रथम वर्णित आचार्य पूरण कश्यप का मानना था की पुण्य आदि का मानव के कर्म पर कोई प्रभाव नहीं होता।

इस श्रृंखला में दूसरा, आजीवक पंथ था जो अपने संस्थापक मक्खलि गोशाल की मृत्यु के बाद लगभग 2000 वर्षों तक जीवित रहा। गोशाल ने पूरण से सहमत होते हुए माना कि अच्छे कार्यों का पुनर्जन्म पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता जो एक सवॅशक्तिमान सिद्धांत 'नियति' के दृढ़ प्रारूप का अनुगमन करती है।

तीसरे आचार्य अजित केशकम्बलिन भौतिकवादी थे। उनका मत विचार दर्शन के इतिहास में अभौतिक इकाइयों में पूर्ण अविश्वास के ये प्राचीनतम उदाहरणों में है।

चौथे आचार्य एक  अणुवादी तथा वैशेषिक परंपरा के पूर्ववर्ती थे, ने ग्रीक डेमोक्रेट्स से लगभग एक सदी पहले अपने सिद्धांत प्रस्तुत की।

पांचवें निगंथ नाथपुत्र कोई और नहीं, वरन् जैन संप्रदाय के अगुआ वर्धमान महावीर ही थे।

छठे तथा अंतिम आचार्य संजय वेलटिठपुत्र अनिश्चयवादी थे उन्होंने पूणॅत: निश्चित ज्ञान की संभावना को नकार दिया।

इनकी तरह अन्य पंचों द्वारा सुझाया गया रास्ता सिद्धांत मात्र की स्वीकृति अथवा ताकिॅक  आधार के विश्वास पर आधारित नहीं था। पुनर्जन्म के क्षेत्र से मुक्ति के लिए व्यक्तिगत तौर पर आधारभूत सिद्धांतो को हृदयंगम करना आवश्यक था जो योग नाम से ज्ञात रहस्यपूर्ण तथा वैरागी तरीके से ही संभव था। इनमें से प्रत्येक की विशिष्ट ध्यान प्रणाली, मानसिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि अभ्यास थे तथा सभी के पास समर्थकों का संगठित दल था। 

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