क्रमशः..
Day - 14
भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम, 1861
- 1861 ई. में भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम ब्रिटिश पार्लियामेंट द्वारा पारित किया गया।
- इस अधिनियम के अन्तर्गत कलकत्ता, बम्बई एवं मद्रास में प्रथम बार उच्च न्यायालयों की स्थापना की गई तथा अब तक विद्यामान सर्वोच्च न्यायालय एवं सदर अदालतों को विलीन कर दिया गया। कालान्तर में इलाहाबाद, पटना, लाहौर आदि स्थानों पर भी उच्च न्यायालयों की स्थापना की गई।
- उच्च न्यायलयों को सिविल, आपराधिक, वैवाहिक, वसीयती आदि मामलों में मूल तथा अपीलीय अधिकारिता प्रदान की गई। अपने अधिनस्थ न्यायालयों पर इनका पर्यवेक्षण कायम किया गया।
- उच्च न्यायालयों के निर्णयों, डिक्रियों, आदेशों आदि के विरुध्द अपील प्रिवी कौंसिल में की जा सकती थी।
- उच्च न्यायालयों को अपनी कार्य-प्रणाली में ‘साम्य, न्याय एवं अन्तःकरण’ के सिध्दान्तो का अनुसरण करना होता था।
विशेष:-
सन् 1834 से 1861 के बीच की अवधि में अर्थात भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम के लागू होने से पहले भारत में दो प्रकार के न्यायालय कार्यरत थे। यह थे सम्राट के न्यायालय और कंपनी के न्यायालय, जिनके अधिकार क्षेत्र भिन्न थे और जिन्होंने दोहरी न्याय प्रणाली को जन्म दिया था। इन दो प्रकार के न्यायालयों को एकीकृत करने के प्रयास सन् 1861 के बहुत पहले ही प्रारंभ हो गये थे। सन् 1858 में ईस्ट इंडिया कंपनी को भंग कर दिया गया और ब्रिटिश सम्राज्ञी द्वारा भारत के शासन को प्रत्यक्ष रूप से संभालने की नीति ने दो प्रकार के न्यायालयों के एकीकरण की समस्या का निराकरण बहुत आसान कर दिया। सभी लोगों पर लागू होने वाली भारतीय दंड संहिता तथा दीवानी और आपराधिक प्रक्रिया संहिताऍं पारित की गई तथा तत्कालीन उच्चतम न्यायालयों और सदर अदालतों का समामेलन न्यायिक प्रशासन में एकरूपता लागू करने का अगला कदम था। इस लक्ष्य की प्राप्ति ब्रिटिश संसद द्वारा सन् 1861 में पारित भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम द्वारा हुई, जिससे ब्रिटेन की महारानी को उच्चतम न्यायालयों तथा सदर अदालतों को समाप्त करने और उनकी जगह बम्बई,कलकत्ता एवं मद्रास की तीनों प्रेसीडेंसियों में एक-एक उच्च न्यायालय जिसे प्रेसीडेंसी नगरों तथा मोफस्सिल के भी सभी न्यायालयों में सर्वोच्च होना था, के गठन का अधिकार दिया गया । उक्त विधेयक पेश करने के समय सर चार्ल्स वुड ने ब्रिटिश संसद में कहा था कि संपूर्ण देश में केवल एक सर्वोच्च न्यायालय होगा तथा दो के बजाय केवल एक अपील न्यायालय होगा और चूंकि कनिष्ठ न्यायालयों में न्यायिक प्रशासन उन निर्देशों पर आधारित होता है जो उनके द्वारा ऊपर की अदालतों में भेजी गई अपीलों का निस्ताररण करते समय जारी किये जाते है, अत: मुझे आशा है कि इस प्रकार गठित उच्चतर न्यायालय सामान्य रूप से पूरे भारत में न्यायिक प्रशासन में सुधार लाऍंगे।
जारी..
मिलते है हम अगले दिन, भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 (मार्ले - मिन्टो सुधार) विषय पर चर्चा करने के लिये..