खेलों के माध्यम से लैंगिक समानता (part 2)

यही वह समय है , जब हम खेलों के माध्यम से अपने समाज को समावेशी बना सकते हैं। अगर न्यायपालिका में जनहित याचिका के पक्ष में निर्णय दिया जाता है, तो यह खेलों में व्याप्त असमानता दूर करने की दिशा में एक प्रेरणदायक कदम होगा।

खेलों के माध्यम से वंचित वर्ग के बच्चों , खासतौर पर लड़कियों को आगे बढ़ाने में सफलता मिल सकेगी। खेलों को न्यायिक संरक्षण मिलने पर (1) बच्चे स्कूल के साथ-साथ अपने आसपास की खाली जगहों को खेलने के लिए इस्तेमाल कर सकेंगे। (2) खेलों को लड़कियों के लिए भी एक सामान्य प्रक्रिया माना जाने लगेगा। उनका दौड़ना, चिल्लाना, गिरना-पड़ना, मिट्टी में लोट जाना आदि असामान्य की दृष्टि से नहीं देखा जाएगा। (3) लड़कियों की आत्म-छवि के निर्माण में दृढ़ता आएगी। उनके अंदर कूटनीतिक सोच , प्रतिस्पर्धा की भावना और नेतृत्व क्षमता का विकास होगा।।

प्राथमिक स्तर पर ऐसा होने के बाद, इनमें से ही प्रतिभाएं ऊभरकर सामने आएंगी। उन्हें सामाजिक सहयोग और संरक्षण प्राप्त हो सकेगा।

कुछ संस्थाएं, जैसे नाज़ फाऊडेशन, खेलों के माध्यम से महिला अधिकारों की रक्षा के लिए जीवन-कौशल का विकास कर रही हैं। इसी प्रकार ब्रिटिश कांऊसिल की चेंजिंग मूव्स चेजिंग मांइन्डस् योजना, खेलों के माध्यम से लैंगिक भेदभाव को दूर करने का प्रयास कर रही है।

खेल-शिक्षा को एक मौलिक अधिकार का दर्जा देकर, लैंगिक समानता जैसे अवरोधों को दूर किया जा सकता है। विकास की राह में यह पहली सीढ़ी की तरह होगा।

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