ह्यूमस -5-10% खनिज लवण - 45% मृदा वायु -25% मृदा वायु -25% किसी भी मृदा की उर्वरक क्षमता फेमस पर निर्भर करती है। इंडियन काउंसिल फॉर एग्रीकल्चर रिसर्च ने मृदा को 8 भागों में विभाजित किया गया है । जलोद मिट्टी - इस मिट्टी का निर्माण नदीगण के द्वारा बहा कर लाए गए पदार्थ से होता है । यह भारत के लगभग 43.3% भाग पर पाई जाती है । यह मृदा पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश ,बिहार, पश्चिम बंगाल, असम तथा कोरोमंडल के तटों पर पाई जाती है। लगभग पूरे उत्तर भारत में यह मिट्टी के दो भागों में विभाजित है
बागर मिट्टी- यह एक पुुरानी जलोद मिट्टी होती है। खादर मिट्टी- यह नई जलोद मिट्टी है। यह मिट्टी रवि और खरीफ की फसल के लिए अच्छी मानी जाती है इस मिट्टी में पोटाश एवं जूना पाया जाता है इस मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी पाई जाती है इस कमी को पूरा करने के लिए यूरिया खाद का प्रयोग किया जाता है (46% नाइट्रोजन)
लाल मिट्टी- यह मिट्टी भारत के 18.6% भाग पर पाई जाती है मिट्टी सबसे ज्यादा तमिलनाडु राज्य में पाई जाती है। यह मिट्टी छत्तीसगढ़, झारखंड, आंध्र प्रदेश तेलंगाना कर्नाटक केरल राज्य में पाई जाती है इस मिट्टी का रंग आयरन की उपस्थिति के कारण लाल होता है यह मिट्टी तंबाकू की खेती के लिए अच्छी मानी जाती है इस मिट्टी में नाइट्रोजन और फास्फोरस की कमी पाई जाती है तथा आयरन की अधिकता पाई जाती है
काली मिट्टी- यह भारत के 16% भाग खेत पर पाई जाती है यह सबसे ज्यादा महाराष्ट्र में पाई जाती है । यह मिट्टी मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, तेलंगाना राज्य में पाई जाती है। इस मिट्टी को रंगून मिट्टी भी कहा जाता है। काली मिट्टी का रंग तेटनीफेरस के कारण तथा बेसाल्ट की चट्टानों के टूटने के कारण काला होता है। यह मिट्टी कपास की खेती के लिए अच्छी मानी जाती है।
लैटेराइट मिट्टी- यह मिट्टी भारत के 37 % भाग पर पाई जाती है। यह मिट्टी सबसे ज्यादा केरल राज्य में पाई जाती है। यह मिट्टी सबसे ज्यादा कठोर होती है ।
मरुस्थलीय मिट्टी- यह मिट्टी भारत के 1.42% भाग पर पाई जाती है इस मिट्टी में खनिज तथा नवमी की कमी पाई जाती है यह सबसे ज्यादा राजस्थान में पाई जाती है।
पर्वतीय मिट्टी- यह मिट्टी जम्मू कश्मीर हिमाचल प्रदेश उत्तराखंड सिक्किम अरुणाचल प्रदेश में पाई जाती है यह मिट्टी सेब और नाशपाती की खेती के लिए अच्छी मानी जाती है ।
मृदा अपरदन- मिट्टी का एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाना प्राकृतिक कारणों के द्वारा तो उसे मृदा अपरदन कहा जाता है पर अपरदन को किसान की मृत्यु कहा जाता है