वातापी के चालुक्य शासक
| शासक |
शासनकाल |
| जयसिंह चालुक्य |
- |
| रणराग |
- |
| पुलकेशी प्रथम |
(550-566 ई.) |
| कीर्तिवर्मा प्रथम |
(566-567 ई.) |
| मंगलेश |
(597-98 से 609 ई.) |
| पुलकेशी द्वितीय |
(609-10 से 642-43 ई.) |
| विक्रमादित्य प्रथम |
(654-55 से 680 ई.) |
| विनयादित्य |
(680 से 696 ई.) |
| विजयादित्य |
(696 से 733 ई.) |
| विक्रमादित्य द्वितीय |
(733 से 745 ई.) |
| कीर्तिवर्मा द्वितीय |
(745 से 753 ई.) |
चालुक्य प्राचीन भारत का एक प्रसिद्ध राजवंश है। इनकी राजधानी बादामी (वातापि) थी। अपने महत्तम विस्तार के समय (सातवीं सदी) यह वर्तमान समय के संपूर्ण कर्नाटक, पश्चिमी महाराष्ट्र, दक्षिणी मध्य प्रदेश, तटीय दक्षिणी गुजरात तथा पश्चिमी आंध्र प्रदेश में फैला हुआ था।
चालुक्यों की उत्पत्ति का विषय अत्यंत ही विवादास्पद है वराहमिहिर की 'बृहत्संहिता' में इन्हें 'शूलिक' जाति का माना गया है, जबकि पृथ्वीराजरासो में इनकी उत्पति आबू पर्वत पर किये गये यज्ञ के अग्निकुण्ड से बतायी गयी है। 'विक्रमांकदेवचरित' में इस वंश की उत्पत्ति भगवान ब्रह्म के चुलुक से बताई गई है। इतिहासविद् 'विन्सेण्ट ए. स्मिथ' इन्हें विदेशी मानते हैं। 'एफ. फ्लीट' तथा 'के.ए. नीलकण्ठ शास्त्री' ने इस वंश का नाम 'चलक्य' बताया है। 'आर.जी. भण्डारकरे' ने इस वंश का प्रारम्भिक नाम 'चालुक्य' का उल्लेख किया है। ह्वेनसांग ने चालुक्य नरेश पुलकेशी द्वितीय को क्षत्रिय कहा है। इस प्रकार चालुक्य नरेशों की वंश एवं उत्पत्ति का कोई अभिलेखीय साक्ष्य नहीं मिलता है ।
वंश शाखाएँ:-
दक्षिणपथ मौर्य साम्राज्य के अंतर्गत था। जब मौर्य सम्राटों की शक्ति शिथिल हुई, और भारत में अनेक प्रदेश उनकी अधीनता से मुक्त होकर स्वतंत्र होने लगे, तो दक्षिणापथ में सातवाहन वंश ने अपने एक पृथक् राज्य की स्थापना की। कालान्तर में इस सातवाहन वंश का बहुत ही उत्कर्ष हुआ, और इसने मगध पर भी अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। शकों के साथ निरन्तर संघर्ष के कारण जब इस राजवंश की शक्ति क्षीण हुई, तो दक्षिणापथ में अनेक नए राजवंशों का प्रादुर्भाव हुआ, जिसमें वाकाटक, कदम्ब और पल्लव वंश के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इन्हीं वंशों में से वातापि या बादामी का चालुक्य वंश और कल्याणी का चालुक्य वंश भी एक था।