संविधान की प्रस्तावना को "संविधान की कुंजी’ कहा जाता है । प्रस्तावना के अनुसार संविधान के अधीन समस्त शक्तियों का केंद्र बिंदु अथवा स्रोत 'भारत के लोग‘ ही हैं ।
प्रस्तावना में लिखित शब्द यथा -"हम भारत के लोग ..... इस संविधान को"अगीकृत्त, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं ।" भारतीय लोगों की सर्वोच्च सम्प्रभुता का उद्घोष करते हैं ।
'प्रस्तावना' को न्यायालय में प्रवर्तित नहीं किया जा सकता यह निर्णय यूनियन आँफ इंडिया बनाम मदन गोपाल, 1957 के निर्णय में घोषित किया गया ।
बेरूबाडी यूनियन बाद (1960) में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि जहां संविधान की भाषा संदिग्ध हो, वहां प्रस्तावना विधिक निर्वाचन में सहायता करती है ।
वेरूबाडी बाद में ही सर्वोच्च न्यायालय ने प्रस्तावना को संविधान का अंग नहीं माना । इसलिए विधायिका प्रस्तावना में संशोधन नहीं कर सकती । परन्तु सर्वोच्च न्यायालय कं कैशयानन्द भारती बनाम केरल राज्य वाद, 1973 ई. में कहा कि प्रस्तावना संविधान का अंग है । इसलिए विधायिका (संसद) उसमें संशोधन कर सकती है । केशवानंद भारती वाद में ही सर्वोच्च न्यायालय ने मूल ढाँचा का सिद्धान्त (theory of basic structure) दिया तया प्रस्तावना को संविधान का मूल ढाँचा माना ।
संसद संविधान की मूल ढाँचा में नकारात्मक संशोधन नहीं कर सकती है, स्पष्टत: संसद वैसा संशोधन कर सकती है, जिससे मूल ढाँचा का विस्तार व मजबूतीकरण होता है ।
42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 ई. के द्वारा इसमें 'समाजवादी' , 'पंथनिरपेक्ष' और 'राष्ट्र की अखण्डता' शब्द जोड़े गये ।