चार्टर अधिनियम 1853 के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी

1853 का चार्टर अधिनियम भारतीयों द्वारा कंपनी की प्रतिक्रियावादी शासन की समाप्ति की मांग तथा गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी द्वारा कंपनी के शासन में सुधार हेतु प्रस्तुत रिपोर्ट के संदर्भ में पारित किया गया था। इस अधिनियम द्वारा विधायी कार्यों को प्रशासनिक कार्यों से पृथक करने की व्यवस्था की गई। विधि निर्माण हेतु भारत के लिए एक अलग 12 सदस्य “विधान परिषद" की स्थापना की गई। विभिन्न क्षेत्रों में प्रांतों के प्रतिनिधियों प को इसका सदस्य बनाकर क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व सिद्धांत लागू किया गया।

 विधान परिषद का प्रमुख कार्य देश के लिए विधि बनाना था किंतु इस विधि को अधिनियम बनाने के लिए गवर्नर जनरल की अनुमति आवश्यक थी ऐसी विधियों को गवर्नर जनरल वीटो भी कर सकता था।


इस अधिनियम द्वारा कंपनी को मिलने वाला 20 वर्ष के लीज को समाप्त कर दिया गया ।इसका अर्थ यह था कि ब्रिटिश संसद अब  किसी भी समय भारत में कंपनी के शासन को समाप्त कर सकती थी।

निदेशकों की संख्या 24 से घटाकर 18 कर दी गई जिसमें 6 सदस्यों की नियुक्ति का अधिकार ब्रिटिश क्राउन को दिया गया।

गवर्नर जनरल को बंगाल के दायित्व से मुक्त कर दिया गया ।बंगाल के लिए एक उप गवर्नर की नियुक्ति की गई।

कार्यकारी और विधायी कार्यों के पृथ्ककरण की भावना से विधायी कार्यों के लिए गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद को बड़ा किया गया

विधि सदस्य कार्यकारी परिषद का सदस्य बना दिया गया।

कर्मचारियों की नियुक्ति के मामले में निदेशकों का का संरक्षण समाप्त कर प्रतियोगिता परीक्षा के माध्यम से नियुक्ति का उपबंध किया गया।

इंग्लैंड में भी एक विधि आयोग  किया गया जो भारतीय विधि आयोग द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट पर विचार कर सकती थी।

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