भूख और गरीबी
इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैश्विक भूख सूचकांक के 119 देशों में भारत को 100वें स्थान पर रखा गया है। इसका सीधा संबंद बेरोजगारी से है। 2015 में भारत के 17 करोड़ या लगभग 12.4 प्रतिशत जनसंख्या के गरीबी में रहने (यानी 123 रुपये प्रतिदिन के खर्च पर) की बात कही गई थी। ऐसे लोग दुसरों की दया पर ही जीवित हैं। सामाजिक सुरक्षा के अभाव में रोजगार ही एकमात्र सहारा हो सकता है। अगर रोजगार के नए अवसर नहीं उत्पन्न होते हैं, तो आर्थिक विकास के साथ आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ेगी।
स्वास्थ्य एवं जन-कल्याण
बेरोजगारी, गरीबी और स्वास्थ्य आपस में जुड़े हुए हैं। गरीबी और खराब स्वास्थ्य बेरोजगारी का कारण बनते हैं। दूसरी ओर, लंबे समय से चली आ रही बेरोजगारी, कौशल में कमी और व्यावसायिक संबंधों में कमी लाती है। साथ ही किसी काम को करने लायक न होने का एक ठप्पा सा लगा दिया जाता है, जो अवसाद को जन्म देता है। इसके कारण परिवार के स्वास्थ्य का खर्च वहन करना मुश्किल होता जाता है। बेरोजगारी-गरीबी-स्वास्थ्य के दुष्चक्र में फंसे लोगों के लिए कुछ सृजनात्मक कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए, जिससे उनकी सोच में सकारात्मकता आए। वे अपने को बेकार न समझें, और किसी न किसी प्रकार से आय के साधन जुटाकर देश के सकल घरेलू उत्पाद में अपना सार्थक योगदान दें।
रोजगार के अवसर उत्पन्न होने से एक परिवार शिक्षा पर खर्च करने के लिए क्षमतावान हो जाता है। विश्व बैंक के अनुसार शिक्षा का हर एक वर्ष, आय के 10 प्रतिशत बढ़ने में योगदान देता है।
नीति-निर्माताओं को यह समझने की आवश्यकता है कि रोजगार उत्पन्न करने के लिए नई सोच को अपनाना होगा। अनौपचारिक क्षेत्र में सफल उद्यमियों का एक नया वर्ग तेजी से ऊभर रहा है। अतः प्रगति, रोजगार और शिक्षा की एक जटिल तिकड़ी की विवेचना की आवश्यकता है।