अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह मे स्थित जनजातियों का समूह?

नवम्बर में, अंडमान निकोबार द्वीप समूह के सेंटीनल द्वीप में रहने वाले जनजाति आदिवासियों ने एक युवा अमेरीकी यात्री को मार दिया। इस समाचार ने पूरे विश्व के मीडिया जगत को एक बार फिर इन ‘आदिवासी रिजर्व’ द्वीपों की खबर लेने को उत्सुक कर दिया है। इस हत्या से ऊपजे विवाद ने भी कमी यहाँ रहने वाले आदिवासियों के समुदायों पर प्रश्न चिन्ह खड़े किए, तो कभी भारतीय सरकार की आदिवासी कल्याण योजनाओं पर।

यहाँ इन प्रश्नों के बजाय, द्वीप के जनजातीय आदिवासियों में छिपी शत्रुता की भावना और सरकारी अधिकारियों एव मानव विज्ञानियों के द्वारा इन तक पहुँच बनाए जाने के प्रयासों पर विचार करना अधिक महत्वपूर्ण है। इससे संबंधित कुछ तथ्य सामने आते हैं।

-औपनिवेशिक रिकार्ड में इन आदिवासियों को ‘सेंटीनल जाररा’ नाम से रेखांकित किया गया है। 1931 के दौरान अधिकारियों ने इस द्वीप की जानकारी के लिए यहाँ कदम भी रखे थे। 1970 के पश्चात् भारतीय अधिकारियों के इस द्वीप में कुछ फोटो भी मिलते हैं। अतः इनके ‘एकाकी’ रहने वाले सिद्धाँत पर संदेह उत्पन्न हाता है।

भारत सरकार ने इनकी भावनाओं की रक्षा के लिए 1989 के सम्मेलन में इन द्वीपों के आदिवासियों के जीवन में अहस्तक्षेप की नीति जारी की थी। इसमें इन आदिवासियों के जीवन, आर्थिक विकास और उनकी संस्थाओं को अपने तरीके से चलाने की उनकी इच्छा का सम्मान करने की बात कही गई है।

इस नीति का संज्ञान लेते हुए अगस्त में सरकार द्वारा अंडमान द्वीप समूह के 29 द्वीपों के प्रतिबंधित क्षेत्र परमिट में ढील दिए जाने वाला आदेश प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है।

इस प्रकार की छूट दिए जाने से आदिवासी बहुल इन क्षेत्रों का व्यवसायीकरण या अतिक्रमण होने में कोई खास समय नहीं लगेगा।

बाहरी व्यक्तियों के प्रति सेंटीनल आदिवासियों की शत्रुता को उनके एकाकीपन की रक्षा की भावना से जोड़ा जाता है। कभी ऐसा लगता है कि वे बाहरी सभ्यता से अपने को अछूता ही रखना चाहते हैं। यह भी अंदाज लगाया जाता है कि शायद अंग्रे्रेजों के राज में उन पर कुछ अत्याचार किए गए। इससे बाहरी व्यक्तियों के प्रति उनमें शत्रुता की भावना जाग्रत हो गई।

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