भारतीय परिषद अधिनियम 1892 और 1873 का अधिनियम

1857 में हुई राज्य  क्रांति का शिक्षा के प्रसार ने भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावना को सुदृढ़ किया । 1885 में कांग्रेस की स्थापना तथा इलवर्ट बिल विवाद के पश्चात भारतीयों को प्रशासन के निर्माण में और अधिक प्रतिनिधित्व देने की मांग ने जोर पकड़ा जिसके फल शुरू हुई है अधिनियम पारित किया गया।

इसके द्वारा केंद्रीय विधान परिषद में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ाकर न्यूनतम 10 तथा अधिकतम 16 नियत की गई। मुंबई, मद्रास और बंगाल प्रांतों में न्यूनतम 8 तथा अधिकतम 20 सदस्य तथा उत्तर पश्चिमी प्रांत में अधिकतम 15 अतिरिक्त सदस्य नियत किए गए।

निर्वाचन पद्धति कारण किया जाना इस अधिनियम की एक प्रमुख विशेषता है। प्रांतीय परिषदों के गैर सरकारी सदस्य नगर पालिका, जिला बोर्ड,  विश्वविद्यालय तथा वाणिज्य मंडल द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित किए जाते थे। इन्हें मनोनीत सदस्य कहा जाता था।
 परिषद के अधिकारों में वृद्धि की गई थी तथा भारतीय सदस्यों को बजट पर प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया। किंतु मतदान कराने या अनुपूरक प्रश्न पूछने का अधिकार नहीं था। इस प्रकार अधिनियम द्वारा अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली तथा अंशत: संसदीय व्यवस्था का प्रारंभ हुआ।

1873 का अधिनियम

इस अधिनियम द्वारा यह उपबंध किया गया कि ईस्ट इंडिया कंपनी किसी भी समय भंग किया जा सकता है। जिसके अनुसरण में एक जनवरी 1884 को ईस्ट इंडिया कंपनी को औपचारिक रुप से बंद कर दिया गया।
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