भारत पर अंग्रेजों की विजय एवं साम्राज्य स्थापना अब तक की अन्य विदेशी विजयो से इस अर्थ में भिन्न थी कि इसमें पहले विजय राजनीतिक सत्ता के अधिग्रहण की होती दी थी परंतु अंग्रेजों ने राजनीतिक सत्ता के अधिग्रहण के साथ-साथ यहां से अर्थ तंत्र को भी अपने अधिकार में ले लिया और औपनिवेशिक अर्थ तंत्र की स्थापना की इसे तीन भागों में बांटा गया है ।
1- वणिकवाद का काल ( 1751-1813 )
2- स्वतंत्र पूंजीवादी का काल ( 1813-1858 )
3- दितीय पूंजीवादी का काल ( 19वीं शताब्दी अंतिम दशक - 1947)
श्री दत्त ने इस विभाजन को एक खाका मात्र मना है इनके अनुसार किसी भी काल के पुराने शोषण का रूप समर्थ नहीं हुआ अपितु नए रूपों में एक आकार होता रहा ब्रिटिश साम्राज्यवाद का मूल इसी में निहित था कि भारतीय अर्थव्यवस्था हमेशा ब्रिटिश अर्थव्यवस्था द्वारा शोषित होती रहे ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने करो, लूट खसोट और व्यवसायिक वणिकवाद के स्थान पर उन्मुक्त व्यापार एक विदेश पूंजी निवेश के जटिल तंत्र की आड़ लेकर शोषण चक्र चकोना आरंभ किया ब्रिटिश साम्राज्यवाद की नीति के तहत भारत की स्थिति महज एक आपूर्तिकर्ता की बनकर रह गई ।