1- वणिकवाद की अवस्था -
1757 के प्लासी युद्ध में अंग्रेजो की विजय के उपरांत वाणिकवाद का युग शुरू हुआ वास्तव में यह आक्रमण राष्ट्रवाद के आर्थिक प्रतिकार था इसका मूलभूत आधार यह था कि समस्त कार्य विधि को राष्ट्र के हित में तथा शक्तिशाली बनाने के लिए नियमित किया जाना चाहिए क्योंकि साम्राज्य विस्तार और वाणिज्य का काम साथ साथ चल रहा था इसलिए राजनीतिक सत्तो का पूरा पूरा सहयोग व्यवसायिक लाभ के लिए किया गया था विदेशी व्यापार का अर्थ यह था कि राजपत्रित व्यापार कंपनियों द्वारा इस का नियमन किया जाए ताकि आयात से अधिक निर्यात हो सके अर्थात व्यापारिक संपूर्ण ब्रिटेन के हित में हो गया तथा ब्रिटेन के अंदर सोना चांदी अधिक मात्रा में पहुंचे ।
2- स्वतंत्र पूंजीवाद का काल -
ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति के कारण नए धनी वर्गों का उदय हुआ जिन्होंने सरकार पर दबाव डाला ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को रोककर भारत का बाजार सभी के लिए खोला जाए सैद्धांतिक रूप से हस्तक्षेप का सिद्धांत प्रसारित हुआ कि बाजार में मासलो में सरकार को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए या मुक्त व्यापार वास्तव में एकतरफा मुक्त व्यापार या जिसमें अंग्रेजी में ने अपने लाभ के अनुसार आयात- निर्यात व्यापार की दरे लागू की इस चरण में भारत को अंग्रेजों ने कृषि उपनिवेश बना डाला अर्थात भारत अब ब्रिटिश मशीनों के लिए कच्चा माल उत्पादित करने वाला देश मात्र बन गया स्वाभाविक था कि भारत में परंपरागत उद्योग नष्ट हो गए बुनकरों की कारीगरों को यह तो कृषि की ओर मोड़ना पड़ा या विवश होकर आत्महत्या करनी पड़ी अर्थात इस चरण में भारतीय उद्योग को पूरी तरह नष्ट करने का प्रयास किया गया ।