पर नारी पैनी छुरी ,मत कोई लाओ अंग।
रावण के 10 सिर गए ,पर नारी के संग।।
हमारे अंतर जगत में राम भी हैं और रावण भी हैं राम परमात्मा है आत्मा के रूप में हमारे भीतर स्थित है ।राम का अंतर जगत में जागरण ही धर्म है परंतु यदि भीतर के राम सुषुप्त हैं तो व्यक्तित्व में अधर्म का ही प्रतिफल दृष्टिगोचर होगा अर्थात रावण का वर्चस्व रहेगा रावण अज्ञान का प्रतीक है अज्ञान के कारण मानव में देह अभिमान और देहात शक्ति की स्थित बनी रहती है ।
अर्थात मानव का स्वयं को दें मात्र ही समझ ना इसलिए भोग पदार्थों कामुकता वह इंद्रियों के सुखों में लिप्त है ना यही अधर्म है आधुनिक वर्ग कहता है तो इसमें क्या हानि है यह तो स्वाभाविक है प्राकृतिक है परंतु आध्यात्मिक का दृष्टिकोण भिन्न है संत कबीर ने दोहा कहा पर नारी पैनी छुरी रावण के 10 सिर गए अर्थात नारी और पुरुष का संग करने से अमर्यादित काम भाव से मानव के संपूर्ण व्यक्तित्व का पतन होता है उसकी स्थूल संपादा रिश्ते नाते मान-सम्मान इत्यादि तथा उसकी सूचना संपदा मानवीय गुण नैतिक मूल्य सब के सब लूट जाते हैं हमारा ध्यान रावण की जीवन और उसके जीवन के प्रत्याशित की ओर केंद्रित करता है।
रावण का जन्म ऋषि के कुल में हुआ अपने जीवन काल में उसने चार वेदों शास्त्रों में प्रवीणता प्राप्त की अग्नि द्रोह करनेवाला यज्ञ आदि कर्मों में संलग्न रहने वाला महा तपस्वी रावण त्रिलोक विजय कहलाता था ।रावण के इसी धार्मिक वैभव को संत कबीर ने उसके सिर ऐसे शूरवीर रावण के जीवन की एक ऐसी व्यवस्था जिस ने उसके सिर धड़ से अलग कर डाला।
भारतीय संस्कृत में धर्म पत्नी की अवधारणा है ।धर्मपत्नी अर्थात जिसके संग विधिवत विवाह संस्कार हुआ है ।उसके अतिरिक्त हर नारी पर नारी है। सृष्टि के प्रथम राजा मनु बने जिन्होंने समाज के आदर्श संचालन हेतु कुछ नियम प्रतिपादित किए ।उनके द्वारा चरित्र स्मृतियां इन्हीं सामाजिक नियमों का संकलन है। इन्हीं स्मृतियों की घोषणा है मात्रवत परदरेषु अर्थात दूसरे की स्त्री को मां के समान मानना चाहिए।