1992 के अधिनियम द्वारा भारतीयों की मांगों की पूर्ति नहीं हो पाई। बाल गंगाधर तिलक जैसे नेताओं ने कांग्रेस की आलोचना की तथा आर सी दत्त , दादाभाई नरोजी एवं अन्य देश भक्तों ने उनका समर्थन किया । लार्ड कर्जन की गलत नीतियों के कारण भी भारतीयों में असंतोष बढ़ा। ब्रिटिश सरकार को 1909 का सुधार अधिनियम पारित करना पड़ा।
1909 अधिनियम की विशेषताएं
1. इसने केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषद के आकार में काफी वृद्धि की। केंद्रीय परिषद में इनकी संख्या 16 से 60 हो गई । प्रांतीय विधानपरिषदों में इनकी संख्या एक समान नहीं थी।
2. इसने केंद्रीय परिषद में सरकारी बहुमत को बनाए रखा लेकिन प्रांतीय परिषदों में गैर सरकारी सदस्यों के बहुमत की अनुमति दी।
3. इसने दोनों स्तरों पर विधान परिषद के चर्चा कार्यों का दायरा बढ़ाया। उदाहरण के तौर पर अनुपूरक प्रश्न पूछना , बजट पर संकल्प रखना आदि।
4. इस अधिनियम के अंतर्गत पहली बार किसी भारतीय को वायसराय और गवर्नर की कार्यकारी परिषद के साथ एसोसिएशन बनाने का प्रावधान किया गया।
5. सत्येंद्र प्रसाद सिन्हा वायसराय की कार्य पालिका परिषद के प्रथम भारतीय सदस्य बने।उन्हें विधि सदस्य बनाया गया था।
6. इस अधिनियम ने पृथक निर्वाचन के आधार पर मुस्लिमों के लिए सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया। इसके अंतर्गत मुस्लिम सदस्यों का चुनाव मुस्लिम मतदाता ही कर सकते थे । इस प्रकार इस अधिनियम ने सांप्रदायिकता को वैधानिकता प्रदान की और लॉर्ड मिंटो को सांप्रदायिक निर्वाचन के जनक के रूप में जाना गया।
7. इसने प्रेसिडेंसी कॉरपोरेशन, चेंबर ऑफ कॉमर्स, विश्वविद्यालयों और जमींदारों के लिए अलग प्रतिनिधित्व का प्रावधान भी किया।