भारतीय स्थापत्य/वास्तुकला एवं मूर्तिकला
वास्तु कला:-
वास्तु कला के अन्तर्गत मंदिर, स्तूप, चैत्य, गुहालेख, मूर्तियाँ, शिलास्तम्भ तथ मुगल कालीन इमारतों को शामिल किया गया है।
वास्तुकला की मुख्य कृतियाँ मंदिर है।
भारत में वास्तुकला का सर्वप्रथम साक्ष्य सैन्धव सभ्यता से प्राप्त होता है।
वास्तुकला को दो भागों में वर्गीकृत किया गया है-
1. शैलोत्कीर्ण वास्तु:-
ऽ जिन गुफाओं एवं आवासों का निर्माण पहाड़ों में खुदाई करके किया जाता है, उन्हें शैलोत्कीर्ण वास्तुकला के अन्तर्गत रखा गया है।
2. स्थापत्य कला /संरचनात्मक वास्तु:-
ऽ जिन भवनों एवं आवासों का निर्माण पत्थर ईंट और गारे की सहायता से किया जाता है उसे स्थापत्य य संरचनात्मक वास्तु कला की श्रेणी में रखते हैं।
मंदिर:-
भारत में मन्दिर निर्माण की तीन उपशैलियाँ पायी गयी है-
1. नागर शैली:-
ऽ इस शैली का विकास गुप्तों के समकालीन नागवंश के शासकों के समय में हुआ। तथा उत्तरी एवं मध्य भारत के मंदिर इस शैली में निर्मित किये गये है।
ऽ इस शैली के मन्दिरों के शिखरों में खड़ी रेखा की प्रधानता होने के कारण इन्हें रेखीय शिखर कहा जाता है।
ऽ इस शैली के मन्दिर चतुर्भुजाकार आकार में बनाये जाते है।
2. द्रविड़ शैली:-
ऽ दक्षिण भारत के मन्दिरों का निर्माण अधिकांशतः द्रविण शैली में किया गया है।
ऽ इस शैली के मंदिर आयताकार तथा शिखरी पिरामिड के आकार के होते है, जिसे विमान कहा जाता है।
3. बेसर शैली:-
ऽ इस शैली के मंदिर गोलाकार में होते है। इसके विकास में चालुक्य शासकों ने सर्वाधिक योगदान दिया।
ऽ यह शैली द्रविड़ एवं नागर शैली का मिश्रित रूप है।