19वीं शताब्दी के प्रारंभ में वहाबी मत की उत्पत्ति एक धार्मिक राजनैतिक आंदोलन के रूप में हुई । धार्मिक रूप में इसका उद्देश्य भारत में इस्लामी समाज की बुराइयों को दूर करना था; राजनैतिक रूप में इसका उद्देश्य भारत पर अंग्रेजों को बाहर कर मुस्लिम शक्ति का पुनरुत्थान करना था।
1820 ई. में बरेली के अहमद द्वारा इसकी स्थापना हुई, इसकी शुरुआत रूहेलखंड में हुई तथा बाद में इसका विस्तार बिहार, बंगाल, पंजाब, पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत एवं दक्कन में हुआ। सैयद अहमद द्वारा 1822 ई. में इसका संगठन तथा विलायत अली, शाहमुहम्मद हुसैन एवं फरहत हुसैन को खलीफा या आध्यात्मिक प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त किया गया।
वहाबियों को हथियार चलाने का प्रशिक्षण तथा सैयद अहमद का पंजाब के सिखों के विरुद्ध अपने धार्मिक युद्ध के लिए, जन-जातियों से सहायता प्राप्त करने के लिए पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांतों को जाना, सिक्खों के विरुद्ध युद्ध (1826-31) एवं बालाकोट की लड़ाई 1831 ई. मैं उसकी मृत्यु प्रारंभिक चरण की अन्य मुख्य घटनाएं थी।
वहाबियों का नेतृत्व संभालने के बाद, विलायत अली ने अंग्रेजों एवं सिखों के साथ युद्ध में मौलवी नसीरुद्दीन को वहाबियों का मुख्य सेनापति बनाया।
विलायत अली की मृत्यु के पश्चात इनायत अली 1852 ई. में वहाबियों का नेता बना; इनायत अली द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध की तैयारी तथा वहाबियों द्वारा मेरठ, बरेली, दिल्ली एवं बंगाल के कई जिलों में राजद्रोह का खुला उपदेश दिया जाना; 1853 ई. में अंग्रेजो के साथ मुठभेड़ में इनायत अली की हार एवं उसका भाग जाना; 1858 में स्वात में बीमारी के कारण इनायत अली की मृत्यु एवं मकसूद अली का नेता बनना 19वीं शताब्दी के मध्य के कुछ महत्वपूर्ण विकास थे।
1857 ई. के विद्रोह में वहाबियों ने कोई भूमिका नहीं निभाई, यद्यपि कुछ स्थानों पर वहाबीयों ने विद्रोह में भाग लिया। मकसूद अली की मृत्यु के पश्चात विलायत अली का बेटा अब्दुल्लाह, सिथाना में वहाबीयों के नेता बना। सिथाना जो कि पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत मे था, 1850 ई. से वहाबीयों का मुख्यालय बना