कूका आंदोलन

वहाबी आंदोलन की तरह कूका आंदोलन भी पंजाब के एक धार्मिक तथा राजनीतिक आंदोलन था; धार्मिक लक्ष्य से ख्वाब का धर्मसुधार ; राजनीतिक लक्ष्य- अंग्रेजों को भगाकर पंजाब में सिखों के प्रभुत्व को पुनः स्थापित करना। इसकी स्थापना भगत जवाहर मल जिसे सियान साहित्य नाम से भी जाना जाता था, द्वारा पश्चिमी पंजाब में 19वीं शताब्दी में की गई। जवाहरमल के बाद बालक सिंह लोगों का नेता बना बालकसिंह के नेतृत्व में आंदोलन का राजनीतिक दृष्टिकोण सर्वोत्तम प्रदर्शित हुआ। पंजाब के विभिन्न भागों में पंथ को संगठित करने के लिए सुबह एवं नायाब सूबा की नियुक्ति;  बड़ी संख्या में (मुख्यतया जाट) लोगों की नियुक्ति, एवं उन्हें सैनिक प्रशिक्षण देना; मंदिरों एवं मूर्तियों को नष्ट करना गाय मारने वाले कार्यों का लोगों द्वारा हत्या इत्यादि के कारण उनका ब्रिटिश अधिकारियों के साथ सीधा संघर्ष शुरू हुआ; कूका लोगों द्वारा विरोध शुरू एवं मलौध और कोटला पर आक्रमण कर 10 लोगों की हत्या;  68 कूका लोगों द्वारा आत्मसमर्पण एवं सभी को अंग्रेजों द्वारा फांसी इनमें से चार लोगों को मिस्टर क्रॉउन लुधियाना के उपायुक्त द्वारा बिना मुकदमा चलाए फांसी दी गई तथा अन्य पर मुकदमा चलाने के बाद फांसी दी गई (जनवरी 1872) ; 1872 ई. में राम सिंह कूका विद्रोह के लिए जिम्मेदार घोषित कर रंगून भेज दिया गया, जहां 1885 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। कूका लोगो मैं केवल गुरु गोबिंद सिंह को सिखों का वास्तविक गुरु माना था। उनके धार्मिक सुधारों में सभी प्रकार की पूजा से निषेध,  जातिप्रथा की समाप्ति, अंतविॅवाह पर रोक, मांस, मदिरा, नशीले पदार्थों एवं मुक्त शारीरिक संबंध से परहेज। 

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