संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष की अहम भूमिका होती है विपक्ष सरकारी निरंकुशता पर नियंत्रण रखता है सरकार की नीतियों को प्रभावित करता है, तथा लोकतंत्र का संरक्षण करता है।
संविधान सभा द्वारा भारत के लिए संसदीय लोकतंत्रात्मक प्रणाली को स्वीकार किया गया, है किंतु लोकतंत्र के सजग का प्रहरी दल तथा विपक्षी नेता के संबंध में संविधान में कोई प्रावधान नहीं किया गया है। संभवता संविधान निर्माताओं ने इसे स्वता: विकसित होने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया था।
भारत में फरवरी 1967 में संपन्न चौथी आम चुनाव तक केंद्र तथा राज्यों में एक ही दल (कांग्रेस) की सरकार रही 1967 के आम चुनाव के बाद कांग्रेस के प्रति जनसाधारण का मोह भंग होना शुरू हुआ। सत्ता से बाहर हुई कांग्रेस (राज्यों में)ने अपने संगठनिक एकता के बूते देश में पहली बार विपक्षी दल की अवधारणा को स्थापित किया।
इसी प्रकार केंद्र में यद्यपि सत्ता कांग्रेस की ही रही तथापि उसकी सदस्य संख्या में गिरावट जिसके परिणाम स्वरुप विपक्ष में बैठने वाले सदस्यों की संख्या में वृद्धि हुई।
इस प्रकार देश में पहली बार विपक्षी दल को औपचारिक रूप से मान्यता मिली।
1959 में पहली बार लोकसभा में राम सुभग सिंह (संगठन कांग्रेस) तथा राज्यसभा में श्यामानंदन मिश्रा को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता प्रदान की गई।
1977 में जनता पार्टी के शासनकाल में संसद द्वारा नेता प्रतिपक्ष (वेतन एवं भत्ता) अधिनियम 1977 पारित किया गया।
नेता प्रतिपक्ष को संविधानिक स्वीकृति मिलने का देश में यह प्रथम अवसर था।
अधिनियम द्वारा नेता प्रतिपक्ष को केबिनेट मंत्री का स्तर प्रदान करते हुए वेतन भत्ते तथा अन्य सुविधाएं देने का प्रावधान किया गया अधिनियम के प्रावधानों के आधार पर नेता प्रतिपक्ष को सूचना के सरकारी माध्यमों पर अपने विचार प्रकट करने के अधिकार को भी मान्यता दी गई इस अधिनियम के अंतर्गत नेता प्रतिपक्ष को प्राप्त सभी सुविधाएं, प्राप्त करने वाले देश के प्रथम नेता प्रतिपक्ष कांग्रेस के यशवंत राव चव्हाण (लोकसभा) थे।
नेता प्रतिपक्ष वेतन एवं भत्ता नियम 1977 के प्रावधानों के अनुसार विपक्षी दल के रूप में ऐसे दल को मान्यता दी जाती है जिसकी सदस्य संख्या सदन की कुल संख्या का 10% हो यदि कई दल इस शर्त को पूरा करते हैं तो उनमें से सबसे अधिक सदस्य संख्या वालें दल को विपक्षी दल के रूप में मान्यता दी जाती है।