अयोध्या part-1 मेरी नजर से

भेजी हुई मूर्ति और उठे हुए हाथ इतिहास लिखते हैं चाहे वह 15 अगस्त 1947 का स्वर्णिम इतिहास हुई है 6 दिसंबर 1992 की सियाह  इबारत। आज पूरे 26बरस हो गए हैं बाबरी विध्वंस को हो सकता है कि कुछ जमाते इसे शौर्य और काला दिवस के रूप में फिर मनाए। कुछ इसे क्रांत की उद्घोष की रजत जयंती भी बता सकते हैं ।पर सच्चाई है कि 6 दिसंबर को जन्मे सांप्रदायिक उन्माद की आंधी ने विश्व के सबसे बड़े धर्म निरपेक्ष और लोकतांत्रिक राष्ट्र के सामने कई यक्ष प्रश्न खड़े कर दिए थे ।

वह सारे सवाल आज तक अनुत्तरित हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड का भरण पोषण और लालन पालन करने वाले का दिन आएगा रामलला इन तमाम सवालों का उत्तर खोजते खोजते  लगभग o गए हैं। जिनकी कृपा से करोड़ों करोड़ों लोगों को सुख संपदा प्रताप प्राप्त होती है वही आज फटे हाल तिरपाल में जीवन जीने की व्यवस्था झेल रहे हैं ।जहां रोजाना सैकड़ों मन मिष्ठान का भोग लगता था। गुरु धूप चंदन से जन्म भूमि और आसपास का क्षेत्र सुभाषित रहता था। वहां अब तो मैं 2,4 लड्डू का स्वाद चखा कर मर्यादा पुरुषोत्तम वहां रह रहे हैं।

राम लला हम आएंगे मंदिर वहीं बनाएंगे का कलरव अब देश में कहीं सुनाई नहीं दे रहा है। वह आएंगे या नहीं यह तो कोई नहीं बता सकता पर देश के आम आम की रामलला से यही गुजारिश है कि 6 दिसंबर इस देश में दोबारा ना आए।

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