क्रमशः..
Day - 17
साइमन आयोग – 1927
1919 के अधिनियम द्वारा स्थापित दोहरी शासन-प्रणाली पूर्ण असफल रही, क्योंकि वह भारत में एक उत्तरदायित्वपूर्ण सरकार की स्थापना न कर सकी। समस्त देश मे असहयोग-अन्दोलन फैल गया और भारतवासियों ने ‘पूर्ण स्वतन्त्रता की माँग की। वर्तमान परिस्थिति को सुधारने के लिए अंग्रेज मजबूर हो गये। अन्त में 1927 में साइमन आयोग की नियुक्ति की गयी। इस प्रकार के आयोग की नियुक्ति के लिये 1919 के अधिनियम में उपबन्ध था। आयोग का कोई भी सदस्य भारतीय नहीं था; फलतः भारत के सभी राजनीतिक दलों ने इस कमीशन का बहिष्कार किया। आयोग की रिपोर्ट से यह स्पष्ट था कि वह भारत में उत्तरदायी केंद्रीय सरकार की स्थापना के विरुध्द था।
आयोग की रिपोर्ट श्वेत पत्र (White Paper) में उल्लिखित सुधारों पर विचार करने के लिए उसे संसद की सेलेक्ट-समिति को सौंप दिया गया। इस समिति के सुझावों के आधार पर ब्रिटिश संसद में एक विधेयक लाया गया जो पारित होकर 1935 का भारत सरकार अधिनियम कहलाया।
भारत सरकार अधिनियम, 1935
- ‘लोथियाँ समिति’ की रिपोर्ट के आधार पर 1935 का भारत सरकार अधिनियम निर्मित किया गया। यह अधिनियम काफी लम्बा एंव जटिल था। इसमें कुल 321 धाराओं एंव सूचियों का समावेश था।
- भारत सरकार अधिनियम, 1935 भारतीय संविधान के इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है क्योंकि इस अधिनियम के लगभग 250 अनुच्छेदों को वर्तमान भारतीय संविधान में समाहित किया गया है।
- यह अधिनियम 03 जुलाई, 1936 से लागू किया गया। वैसे पूर्णरूप से यह 1937 के विधान सभा चुनावों के बाद ही लागू हो सका।
- भारत सरकार अधिनियम, 1935 की प्रमुख विशेषताएं निम्नवत् थीं-
- इस अधिनियम के तहत एक ‘संघीय न्यायालय’ (Federal Court) एवं ‘भारतीय रिजर्व बैंक’ (R.B.I.) की स्थापना की गई।
- इस अधिनियम के माध्यम से भारत में प्रथम बार ‘संघात्मक शासन’ की स्थापना की गई। यह विभिन्न प्रान्तों एवं रियायतों से मिलकर बना था। राज्यों का संघ में सम्मिलित होना उनकी इच्छा पर निर्भर करता था।
- प्रान्तो मे स्थापित की गई दोहरी शासन-व्यवस्था को इस अधिनियम ने समाप्त कर दिया और इसे केन्द्र में प्रारम्भ किया गया। प्रशासन-सम्बन्धी विषयों को दो भागों में विभाजित किया गया – (1) आरक्षित विषय, एवं (2) हस्तान्तरित विषय।
- आरक्षित सूची में प्रतिरक्षा, विदेशी मामले जैसे महत्वपूर्ण विषय सम्मिलित किये गये जबकि हस्तान्तरित सूची में कम महत्व के विषय रखे गये थे। दोनों का प्रशासन- ‘गवर्नर- जनरल-इन-कौंसिल’ के हाथों में था। लेकिन आरक्षित विषयों के लिए वह विधान-सभा के प्रति उत्तर्दायी नही थी।
- इस अधिनियम की महत्वपूर्ण देन एवं उपलब्धि प्रान्तों में स्वायत्त शासन की स्थापना मानी जाती है। यद्यपि यह व्यवस्था सन् 1919 के अधिनियम द्वारा ही कर दी गई थी, लेकिन सन् 1935के अधिनियम द्वारा प्रान्तीय विषयों पर विधि निर्माण का अनन्य अधिकार प्रान्तों को सौंप दिया गया और इस पर केन्द्र के नियंत्रण को समाप्त्कर दिया गया।
- केन्द्रीय विधान मण्डल को नया स्वरुप प्रदान किया गया। इसके दो सदन होते थे – विधान सभा और राज्य परिषद्। विधान सभा की अधिकतम अवधि पाँच वर्ष थी जबकि राज्य परिषद् एक स्थायी संस्था थी, जिसके एक-तिहाई सदस्य प्रति दूसरे वर्ष की समाप्ति पर सेवानिवृत्त होते थे।
- केन्द्र की तरह प्रान्तों में भी दो सदनों वाले विधान मण्डल की स्थापना की गई। यह सदन विधान सभा एवं विधान परिषद् के नाम से सम्बोधित किये जाते थे। विधान सभा की अवधि पाँच वर्ष थी जबकि विधान परिषद् एक स्थायी संस्था होती थी जिसके एक-तिहाई सदस्य प्रति दो वर्ष की समाप्ति पर सेवानिवृत्त हो जाते थे। ठीक यही व्यवस्था वर्तमान संविधान में अंगीकृत की गई है।
- इस अधिनियम द्वारा केन्द्र तथा प्रान्तों में शक्तियों का विभाजन किया गया। इसके लिए विधि-निर्माण के प्रयोजनार्थ विषयों को तीन भागों में वर्गीकृत कर उन्हें तीन सूचियों – संघ सूची, प्रान्तीय सूची एवं समवर्ती सूची रखा गया। संघ सूची (59 विषय) में सम्पूर्ण भारत के हित वाले विषय रखे गये। जबकि प्रान्तीय सूची (54 विषय) में प्रान्तों के हित वाले विषय रखे गये। समवर्ती सूची (36 विषय) में विहित विषय यद्यपि प्रान्तीय हित वाले विषय थे, लेकिन इसमें एकरुपता बनाये रखने के लिए केन्द्रीय विधानमण्डल भी इन विषयों पर विधि बना सकता था। दोनों में असंगति होने पर प्रान्तीय विधि पर केन्द्रीय विधि अधिभावी होती थी। वर्तमान संविधान में यही व्यवस्था है।
- न्यायिक क्षेत्र में उच्चतम न्यायालय के रुप में भारत में एक ‘संघीय न्यायालय’ की स्थापना की गई। इस्का मुख्यालय ’दिल्ली’ में रखा गया। इसमें एक्मुख्य न्यायाधिश तथा सात अन्य न्यायाधीश होते थे जो 65 वर्ष की आयु तक अपने पद पर बने रहते थे।
- यद्यपि सन् 1935 के अधिनियम में ऐसी कई महत्वपूर्ण व्यवस्थायें की गई थीं जो वर्तमान संविधान का आधार है, लेकिन वे भी अन्तिम रूप से भारतवासियों की आशाओं एवं आकांक्षाओं के अनुरूप साबित नही हो सकीं। परिणाम यह हुआ कि भारतवासियों की आशाओं के अनुरुप विधान बनाने के लिए कालान्तर में क्रिप्स मिशन, कैबिनेट मिशन आदि का गठन किया गया जिनके सुझावों की परिणति भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 में हुई।
जारी..
मिलते है हम अगले दिन, क्रिप्स मिशन,1942 और कैबिनेट-मिशन, 1946 विषय पर चर्चा करने के लिये..