अलबरूनी-

- अलबरूनी का जन्म 976 ईस्वी में ख्वारिज्म (आधुनिक उज़्बेकिस्तान) में हुआ था अलबरूनी कई भाषाओं का ज्ञाता था जिसमें सीरियाई फारसी हिब्रू और संस्कृत शामिल है 1017 में ख्वारिज्मी पर आक्रमण के पश्चात महमूद गजनवी यहां से अनेक विद्वानों व कवियों को अपने साथ राजधानी गजनी ले गया जिसमें एक अलबरूनी भी था|

- अलबरूनी बंधक के रूप में गजनी आया था| परंतु धीरे-धीरे उसे शहर पसंद आने लगा और 70 वर्ष की आयु में अपनी मृत्यु तक शेष जीवन यही बताया गजनी में ही अलबरूनी को भारत के प्रति रुचि विकसित हुई अलबरूनी ने ब्राह्मण पुरोहित और विद्वानों के साथ कई वर्ष बिताए तथा संस्कृत धर्म दर्शन का ज्ञान प्राप्त किया| अनेक भाषाओं में दक्षता हासिल करने के कारण अलबरूनी भाषाओं की तुलना व ग्रंथों का अनुवाद करने में सक्षम था उसने कई संस्कृत कृतियों में जिनमें पतंजलि क्या व्याकरण ग्रंथ भी था इसका अनुवाद अरबी में किया|

 किताब उल हिंद-

.                         -यह अलबरूनी द्वारा अरबी भाषा में लिखी गई पुस्तक है इसकी भाषा सरल और स्पष्ट है यह एक विस्तारित ग्रंथ है जो धर्म दर्शन त्यौहार खगोल विज्ञान रीति-रिवाजों प्रथाओं सामाजिक जीवन माप तोल और मापन विधि मूर्तिकला और कानून इत्यादि विषयों के आधार पर 80 अध्यायों में विभाजित है|

.   अलबरूनी ने प्रत्येक अध्याय में एक विशिष्ट शैली का प्रयोग किया है जिस के आरंभ में एक प्रश्न होता है फिर संस्कृत वादी परंपराओं पर आधारित वर्णन और अंत में अन्य संस्कृतियों के साथ एक तुलना की जाती है|

इन समस्याओं की जानकारी होने पर भी अलबरूनी लगभग पूर्ण रूप से ब्राह्मणों द्वारा रचित कृतियों पर आश्रित रहा वह भारतीय समाज को समझने के लिए वेद ,पुराण, भगवद्गीता  ,पतंजलि की कृतियों व मनुस्मृति  इत्यादि पर निर्भर रहा|

-संस्कृत के विषय में अलबरूनी लिखता है कि संस्कृत भाषा सीखना सरल नहीं है क्योंकि अरबी भाषा की ही पहुंच बहुत विस्तृत है यह बताता है कि इस्लाम में सभी लोगों को समान माना जाता है तथा भिन्न बताएं केवल धार्मिकता के पालन में थी जाति व्यवस्था के संदर्भ में ब्राह्मणवादी व्यवस्था को मानने के बावजूद अलबरूनी ने पवित्रता की मान्यता को स्वीकार नहीं किया है उसके अनुसार जाति व्यवस्था में निहित  आपवित्रता की धारणा प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है|

-उसने यह भी लिखा है कि प्रत्येक वस्तु जो अपवित्र हो जाती है पवित्रता को पुनः प्राप्त करने का प्रयास करती हैं तथा उसमें सफल भी होती है|

-अलबरूनी लिखता है कि  वैश्य और शूद्र वर्ण के बीच अधिक अंतर नहीं है यह दोनों एक साथ ही शहर व गांव में रहते हैं जाति व्यवस्था के विषय में अलबरूनी का विवरण संस्कृत ग्रंथों से पूर्ण रूप से प्रभावित है यद्यपि  शाब्दिक रूप से व्यवस्था से परे सामाजिक प्रताड़ना के शिकार थे परंतु फिर भी अर्थतंत्र का हिस्सा थे|

 

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