प्रथम आंग्ल-सिक्ख युद्ध (1845-46)

अंग्रेज सदैव से पंजाब की उर्वर भूमि को ललचाई नजर से देख रहे थे। केवल मौके की तलाश में थे। रणजीत सिंह के समय में तो यह सम्भव नही हो पाया, लेकिन उसके मरणोपरांत सिखों के आपसी कलह दे उन्हें यह मौका प्रदान कर दिया। 1843 में मेजर ब्रॉडफुड की लुधियाने में कंपनी के एजेंट के रूप में नियुक्ति हुई। उसने स्थिति और बिगाड़ दी उसने घोषणा की कि सतलज पार की सभी रियासते  कंपनी के ना केवल संरक्षण में है, अपितु महाराजा दलीप सिंह की मृत्यु पर  से  सब  ज़ब्त    हो जाएंगे। अंग्रेजों ने युद्ध के लिए धीरे-धीरे पूर्ण तैयारी कर ली थी।

        सिखों ने अंग्रेजों की युद्ध तैयारी का केवल एक ही अर्थ निकाला कि वह आक्रमण तथा युद्ध करना चाहते हैं, तो उन्हें युद्ध पंजाब की धरती पर नहीं अपितु अंग्रेजों के अधीन प्रदेशों में ही लड़ना है।

        11 दिसंबर 1845 को सिक्ख सेना ने हरिके तथा कसूर के बीच सतलज नदी को पार किया था तथा सर ह्यूगफ के अधीन अंग्रेजी सेना से टक्कर ली। 13 दिसंबर 1845 को हेनरी हार्डिंग्स युद्ध की घोषणा कर दी तथा कहा कि महाराजा दलीप सिंह के राज्य का वह भाग जो इस युद्ध में जो सतलज के बाई ओर है आज से अंग्रेजी राज्य में मिलाया जाता है।

        इस युद्ध में चार लड़ाइयां  मुदकी, फिरोज शाह, बद्दोवाल तथा अलीबाग ऐसी हुई जो निर्णायक नहीं थी। केवल 5 वी सवरावों की लड़ाई 10 फरवरी 1846 को निर्णायक सिद्ध हुई। लाल सिंह तथा तेज सिंह के विश्वासघात के कारण जिन्होंने सिखों की खाईयों का भेद अंग्रेजों के को दे दिये तथा बिना लड़े भाग गए ।सिखों की पूर्णता हार हुई अंग्रेजी सेना ने लाहौर पर अधिकार कर लिया तथा 9 मार्च 1846 को सिखों को लाहौर की संधि पर हस्ताक्षर करने पर बाध्य किया। इस संधि में निम्नलिखित बातें की गई :-

  • 1.5 करोड़ जुर्माना हेनरी लॉरेंस ।
  • लाहौर का रेजिडेंट नियुक्त ।
  • महाराजा की सेना सीमित की गई ।
  • सतलुज पार के सभी प्रदेश अंग्रेजों को मिले।
  • सतलुज  तथा  व्यास  के बीच स्थित समस्त दुर्गों पर अंग्रेजों का अधिकार।
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