द्वितीय आंग्ल- सिक्ख युद्ध (1848-49)

इमामुद्दीन कश्मीर का गवर्नर  फकीरनूरुद्दीन, तेजा सिंह, शेर सिंह पिता दीनानाथ लाहौर शासन का प्रतिनिधि मंडल के सदस्य थे।  22 दिसंबर 1846 को भैरव वाल की संधि के अंतर्गत अंग्रेजी सेना के रहने की अवधि बढ़ाई गई तथा इसके खर्च के लिए ₹2200000 दरबार को देना था।

          महाराजा के व्यस्त होने तक पंजाब का शासन अंग्रेजों को सौंप दिया गया,  इस तरह लाहौर में अंग्रेज रेसिडेंट का राज्य हो गया।  जब रानी जिंदा  ने रेजिडेंट के अधिकारों पर आपत्ति की तो 22 तो 20 अगस्त 1847 को गवर्नर जनरल ने घोषणा की कि महाराजा  की शिक्षा के हित में यह आवश्यक है कि महाराजा को महारानी जिंदा से प्रथक रखा जाए ।महारानी को शेखपुरा भेज दिया गया। तथा उसका भत्ता केवल ₹48000 वार्षिक निश्चित किया गया जनवरी 1848 में डलहौजी गवर्नर जनरल बना  डलहौजी साम्राज्यवादी था तथा उसका यह विश्वास था कि हमें नए प्रदेश प्राप्त करने का कोई अवसर नहीं खोना चाहिए।

          मूलराज के विद्रोह ने मुल्तान का गवर्नर पंजाब पर आक्रमण कर अवसर प्रदान किया। मूलराज के इस्तीफा देने के बाद काहन सिंह को मुल्तान का  गवर्नर नियुक्त किया गया। चरत सिंह हजारा प्रांत के गवर्नर ।

         16 नवंबर 1848 में जनरल गाफ़ के नेतृत्व में एक सेना रावी पार की तथा रामनगर के स्थान पर एक निर्णायक युद्ध लड़ा।  मुल्तान ने जनवरी 1849 में हथियार डाल दिए चिलियानवाला के स्थान पर एक और निर्णायक युद्ध हुआ, जिसमें अंग्रेजों को भारी क्षति पहुंची।  परंतु गुजरात के स्थान पर सर चार्ल्स नेपियर जो अब गाफ़ के स्थान पर सेना का नेतृत्व कर रहा था। मित्रों के युद्ध में सिखों को परास्त किया यह अंतिम तथा पूर्णतया निर्णायक युद्ध था। इसके बाद समस्त पंजाब अंग्रेजों के अधिकार में आ गया था। 29 मार्च 1849 को गवर्नर जनरल की ओर से घोषणा हुई कि पंजाब का राज समाप्त हो गया है तथा दिलीप सिंह के सभी प्रदेश भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य का अंग बन गया। 

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